गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताए / Muktibodh Poems In Hindi

अगर आप भी गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओ को पढ़ना और सुनना पसन्द करते है तो यह पोस्ट आपके लिए क्योकि यहॉ बेहतरीन Muktibodh Poems In Hindi उपलब्ध कराई गई है जिसे आप नीचे से पढ़ना शुरू करे ।

तो चलिए बिना किसी तरह की देर किये Muktibodh Poems की शुरूवात करे ।

विषय सूची

कल और आज | गजानन माधव मुक्तिबोध

अभी कल तक गालियाँ

देते थे तुम्हें

हताश खेतिहर,

 

अभी कल तक

धूल में नहाते थे

गौरैयों के झुंड,

 

अभी कल तक

पथराई हुई थी

धनहर खेतों की माटी,

 

अभी कल तक

दुबके पड़े थे मेंढक,

उदास बदतंग था आसमान !

 

और आज

ऊपर ही ऊपर तन गये हैं

तुम्हारे तंबू,

 

और आज

छमका रही है पावस रानी

बूंदा बूंदियों की अपनी पायल,

 

और आज

चालू हो गई है

झींगुरों की शहनाई अविराम,

 

और आज

जोर से कूक पड़े

नाचते थिरकते मोर,

और आज

 आ गई वापस जान

दूब की झुलसी शिराओं के अंदर,

 

और आज

विदा हुआ चुपचाप ग्रीष्म

समेट कर अपने लाव-लश्कर ।

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घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा | गजानन माधव मुक्तिबोध 

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा

तेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगा

हिमवत, जड़, निःस्पन्द हृदय के अन्धकार में जीवन-भय है

तेरे तीक्ष्ण बाण की नोकों पर जीवन-सँचार करेगा।

 

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अन्तर में उतरेंगे

तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे

कोपित तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन

रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन।

 

सभी उरों के अन्धकार में एक तड़ित वेदना उठेगी

तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित, जड़ावरण की महि फटेगी

शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अँकुर

दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी।

 

हे रहस्यमय ! ध्वंस-महाप्रभु, ओ ! जीवन के तेज सनातन

तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सर्जन

हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वन्दन

मेरे सर पर एक पैर रख, नाप तीन जग तू असीम बन ।

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चाहिए मुझे मेरा असंग बबूल पन | गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे नहीं मालूम

मेरी प्रतिक्रियाएँ

सही हैं या ग़लत हैं या और कुछ

सच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्य

 

सुबह से शाम तक

मन में ही

आड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँ

अपनी ही काटपीट

ग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में कि

इतना उलझ जाता हूँ कि

जहर नहीं

लिखने की स्याही में पीता हूँ कि

नीला मुँह…

दायित्व-भावों की तुलना में

अपना ही व्यक्ति जब देखता

तो पाता हूँ कि

खुद नहीं मालूम

सही हूँ या गलत हूँ

या और कुछ

 

सत्य हूँ कि सिर्फ मैं कहने की तारीफ

मनोहर केन्द्र में

खूबसूरत मजेदार

बिजली के खम्भे पर

अँगड़ाई लेते हुए मेहराबदार चार

तड़ित-प्रकाश-दीप…

खम्भे के अलंकार!!

 

सत्य मेरा अलंकार यदि, हाय

तो फिर मैं बुरा हूँ.

निजत्व तुम्हारा, प्राण-स्वप्न तुम्हारा और

व्यक्तित्व तड़ित्-अग्नि-भारवाही तार-तार

बिजली के खम्भे की भांति ही

कन्धों पर रख मैं

विभिन्न तुम्हारे मुख-भाव कान्ति-रश्मि-दीप

निज के हृदय-प्राण

वक्ष से प्रकट, आविर्भूत, अभिव्यक्त

यदि करता हूँ तो….

दोष तुम्हारा है

 

मैंने नहीं कहा था कि

मेरी इस जिन्दगी के बन्द किवार की

दरार से

रश्मि-सी घुसो और विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों पर

प्रत्यावर्तित होती रहो

मनोज्ञ रश्मि की लीला बन

होती हो प्रत्यावर्तित विभिन्न कोणों से

विभिन्न शीशों पर

आकाशीय मार्ग से रश्मि-प्रवाहों के

कमरे के सूने में सांवले

निज-चेतस् आलोक

 

सत्य है कि

बहुत भव्य रम्य विशाल मृदु

कोई चीज़

कभी-कभी सिकुड़ती है इतनी कि

तुच्छ और क्षुद्र ही लगती है!!

मेरे भीतर आलोचनाशील आँख

बुद्धि की सचाई से

कल्पनाशील दृग फोड़ती!!

 

संवेदनशील मैं कि चिन्ताग्रस्त

कभी बहुत कुद्ध हो

सोचता हूँ

मैंने नहीं कहा था कि तुम मुझे

अपना सम्बल बना लो

मुझे नहीं चाहिए निज वक्ष कोई मुख

किसी पुष्पलता के विकास-प्रसार-हित

जाली नहीं बनूंगा मैं बांस की

जाहिए मुझे मैं

चाहिए मुझे मेरा खोया हुए

रूखा सूखा व्यक्तित्व

 

चाहिए मुझे मेरा पाषाण

चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन

कौन हो की कही की अजीब तुम

बीसवीं सदी की एक

नालायक ट्रैजेडी

 

जमाने की दुखान्त मूर्खता

फैन्टेसी मनोहर

बुदबुदाता हुआ आत्म संवाद

होठों का बेवकूफ़ कथ्य और

 

फफक-फफक ढुला अश्रुजल

अरी तुम षडयन्त्र-व्यूह-जाल-फंसी हुई

अजान सब पैंतरों से बातों से

भोले विश्वास की सहजता

स्वाभाविक सौंप

यह प्राकृतिक हृदय-दान

बेसिकली गलत तुम।

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जब दुपहरी ज़िन्दगी पर… | गजानन माधव मुक्तिबोध 

जब दुपहरी ज़िन्दगी पर... | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर… | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems

जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरज

एक जॉबर-सा

बराबर रौब अपना गाँठता-सा है

कि रोज़ी छूटने का डर हमें

फटकारता-सा काम दिन का बाँटता-सा है

अचानक ही हमें बेखौफ़ करती तब

हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही

थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई

पास पा के भी

बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में

उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा

बेरुह इस काले ज़माने में

जब दुपहरी ज़िन्दगी को रोज़ सूरज

जिन्न-सा पीछे पड़ा

रोज़ की इस राह पर

यों सुबह-शाम ख़याल आते हैं…

आगाह करते से हमें… ?

या बेराह करते से हमें ?

यह सुबह की धूल सुबह के इरादों-सी

सुनहली होकर हवा में ख़्वाब लहराती

सिफ़त-से ज़िन्दगी में नई इज़्ज़त, आब लहराती

दिलों के गुम्बजों में

बन्द बासी हवाओं के बादलों को दूर करती-सी

सुबह की राह के केसरिया

गली का मुँह अचानक चूमती-सी है

कि पैरों में हमारे नई मस्ती झूमती-सी है

सुबह की राह पर हम सीखचों को भूल इठलाते

चले जाते मिलों में मदरसों में

फ़तह पाने के लिए

क्या फ़तह के ये ख़याल ख़याल हैं

क्या सिर्फ धोखा है ?…

सवाल है।

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दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांग उटांग | गजानन माधव मुक्तिबोध

स्वप्न के भीतर स्वप्न,

विचारधारा के भीतर और

एक अन्य

सघन विचारधारा प्रच्छन!!

कथ्य के भीतर एक अनुरोधी

विरुद्ध विपरीत,

नेपथ्य संगीत!!

मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क

उसके भी अन्दर एक और कक्ष

कक्ष के भीतर

एक गुप्त प्रकोष्ठ और

कोठे के साँवले गुहान्धकार में

मजबूत…सन्दूक़

दृढ़, भारी-भरकम

और उस सन्दूक़ भीतर कोई बन्द है

यक्ष

या कि ओरांगउटांग हाय

अरे! डर यह है…

न ओरांग…उटांग कहीं छूट जाय,

कहीं प्रत्यक्ष न यक्ष हो।

क़रीने से सजे हुए संस्कृत…प्रभामय

अध्ययन-गृह में

बहस उठ खड़ी जब होती है–

विवाद में हिस्सा लेता हुआ मैं

सुनता हूँ ध्यान से

अपने ही शब्दों का नाद, प्रवाह और

पाता हूँ अक्समात्

स्वयं के स्वर में

ओरांगउटांग की बौखलाती हुंकृति ध्वनियाँ

एकाएक भयभीत

पाता हूँ पसीने से सिंचित

अपना यह नग्न मन!

हाय-हाय औऱ न जान ले

कि नग्न और विद्रूप

असत्य शक्ति का प्रतिरूप

प्राकृत औरांग…उटांग यह

मुझमें छिपा हुआ है।

 

स्वयं की ग्रीवा पर

फेरता हूँ हाथ कि

करता हूँ महसूस

एकाएक गरदन पर उगी हुई

सघन अयाल और

शब्दों पर उगे हुए बाल तथा

वाक्यों में ओरांग…उटांग के

बढ़े हुए नाख़ून!!

 

दीखती है सहसा

अपनी ही गुच्छेदार मूँछ

जो कि बनती है कविता

 

अपने ही बड़े-बड़े दाँत

जो कि बनते है तर्क और

दीखता है प्रत्यक्ष

बौना यह भाल और

झुका हुआ माथा

 

जाता हूँ चौंक मैं निज से

अपनी ही बालदार सज से

कपाल की धज से।

 

और, मैं विद्रूप वेदना से ग्रस्त हो

करता हूँ धड़ से बन्द

वह सन्दूक़

करता हूँ महसूस

हाथ में पिस्तौल बन्दूक़!!

अगर कहीं पेटी वह खुल जाए,

ओरांगउटांग यदि उसमें से उठ पड़े,

धाँय धाँय गोली दागी जाएगी।

रक्ताल…फैला हुआ सब ओर

ओरांगउटांग का लाल-लाल

ख़ून, तत्काल…

ताला लगा देता हूँ में पेटी का

बन्द है सन्दूक़!!

अब इस प्रकोष्ठ के बाहस आ

अनेक कमरों को पार करता हुआ

संस्कृत प्रभामय अध्ययन-गृह में

अदृश्य रूप से प्रवेश कर

चली हुई बहस में भाग ले रहा हूँ!!

सोचता हूँ–विवाद में ग्रस्त कईं लोग

कई तल

 

सत्य के बहाने

स्वयं को चाहते है प्रस्थापित करना।

अहं को, तथ्य के बहाने।

मेरी जीभ एकाएक ताल से चिपकती

अक्ल क्षारयुक्त-सी होती है

और मेरी आँखें उन बहस करनेवालों के

कपड़ों में छिपी हुई

सघन रहस्यमय लम्बी पूँछ देखती!!

और मैं सोचता हूँ…

कैसे सत्य हैं–

ढाँक रखना चाहते हैं बड़े-बड़े

नाख़ून!!

 

किसके लिए हैं वे बाघनख!!

कौन अभागा वह!!

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नाश देवता | गजानन माधव मुक्तिबोध

नाश देवता | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh ki kavita
नाश देवता | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh ki kavita

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,

तेरी प्रत्यंचा का कंपन सूनेपन का भार हरेगा

हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है

तेरे तीक्ष्ण बाणों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

 

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,

तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे

कोपुत तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन

रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

 

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,

तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की महि फटेगी

शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर

दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

 

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,

तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सृजन

हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन

मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।

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पता नहीं… | गजानन माधव मुक्तिबोध

पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिले

किस साँझ मिले, किस सुबह मिले!!

यह राह ज़िन्दगी की

 जिससे जिस जगह मिले

है ठीक वही, बस वही अहाते मेंहदी के

जिनके भीतर

है कोई घर

बाहर प्रसन्न पीली कनेर

बरगद ऊँचा, ज़मीन गीली

मन जिन्हें देख कल्पना करेगा जाने क्या!!

तब बैठ एक

गम्भीर वृक्ष के तले

टटोलो मन, जिससे जिस छोर मिले,

कर अपने-अपने तप्त अनुभवों की तुलना

घुलना मिलना!!

यह सही है कि चिलचिला रहे फासले,

तेज़ दुपहर भूरी

सब ओर गरम धार-सा रेंगता चला

काल बाँका-तिरछा;

पर, हाथ तुम्हारे में जब भी मित्रता का हाथ

फैलेगी बरगद-छाँह वही

गहरी-गहरी सपनीली-सी

जिसमें खुलकर सामने दिखेगी उरस्-स्पृशा

स्वर्गीय उषा

लाखों आँखों से, गहरी अन्तःकरण तृषा

तुमको निहारती बैठेगी

 आत्मीय और इतनी प्रसन्न,

मानव के प्रति, मानव के

 जी की पुकार

 जितनी अनन्य!

लाखों आँखों से तुम्हें देखती बैठेगी

वह भव्य तृषा

इतने समीप

ज्यों लालीभरा पास बैठा हो आसमान

आँचल फैला,

अपनेपन की प्रकाश-वर्षा

में रुधिर-स्नात हँसता समुद्र

अपनी गम्भीरता के विरुद्ध चंचल होगा।

मुख है कि मात्र आँखें है वे आलोकभरी,

जो सतत तुम्हारी थाह लिए होतीं गहरी,

इतनी गहरी

कि तुम्हारी थाहों में अजीब हलचल,

मानो अनजाने रत्नों की अनपहचानी-सी चोरी में

धर लिए गये,

निज में बसने, कस लिए गए।

तब तुम्हें लगेगा अकस्मात्,

………..

ले प्रतिभाओं का सार, स्फुलिंगों का समूह

सबके मन का

जो बना है एक अग्नि-व्यूह

अन्तस्तल में,

उस पर जो छायी हैं ठण्डी

प्रस्तर-सतहें

सहसा काँपी, तड़कीं, टूटीं

औ भीतर का वह ज्वलत् कोष

ही निकल पड़ा !!

उत्कलित हुआ प्रज्वलित कमल !!

यह कैसी घटना है…

कि स्वप्न की रचना है।

उस कमल-कोष के पराग-स्तर

पर खड़ा हुआ

सहसा होता प्रकट एक

वह शक्ति-पुरुष

जो दोनों हाथों आसमान थामता हुआ

आता समीप अत्यन्त निकट

आतुर उत्कट

तुमको कन्धे पर बिठला ले जाने किस ओर

 न जाने कहाँ व कितनी दूर !!

फिर वही यात्रा सुदूर की,

फिर वही भटकती हुई खोज भरपूर की,

कि वही आत्मचेतस् अन्तःसम्भावना,

…जाने किन खतरों में जूझे ज़िन्दगी !!

अपनी धकधक

में दर्दीले फैले-फैलेपन की मिठास,

या निःस्वात्मक विकास का युग

जिसकी मानव गति को सुनकर

तुम दौड़ोगे प्रत्येक व्यक्ति के

 चरण-तले जनपथ बनकर !!

वे आस्थाएँ तुमको दरिद्र करवायेंगी

कि दैन्य ही भोगोगे

पर, तुम अनन्य होगे,

 प्रसन्न होगे !!

आत्मीय एक छवि तुम्हें नित्य भटकायेगी

जिस जगह, जहाँ जो छोर मिले

ले जाएगी…

…पता नहीं, कब, कौन, कहाँ, किस ओर मिले।

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पूंजीवादी समाज के प्रति | गजानन माधव मुक्तिबोध 

पूंजीवादी समाज के प्रति | गजानन माधव मुक्तिबोध  / muktibodh poems
पूंजीवादी समाज के प्रति | गजानन माधव मुक्तिबोध  / muktibodh poems

इतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धि

इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि

इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति

यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति

इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –

जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध

इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –

केवल एक जलता सत्य देने टाल।

छोड़ो हाय, केवल घृणा औ दुर्गंध

तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध

देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध

तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध

तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र

तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र

तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र

तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।

मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक

अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक

तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ

तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।

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ब्रह्मराक्षस | गजानन माधव मुक्तिबोध

शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़

परित्यक्त सूनी बावड़ी

के भीतरी

ठण्डे अंधेरे में

बसी गहराइयाँ जल की…

सीढ़ियाँ डूबी अनेकों

उस पुराने घिरे पानी में…

समझ में आ न सकता हो

कि जैसे बात का आधार

लेकिन बात गहरी हो।

बावड़ी को घेर

डालें खूब उलझी हैं,

खड़े हैं मौन औदुम्बर।

व शाखों पर

लटकते घुग्घुओं के घोंसले

परित्यक्त भूरे गोल।

विद्युत शत पुण्यों का आभास

जंगली हरी कच्ची गंध में बसकर

हवा में तैर

बनता है गहन संदेह

अनजानी किसी बीती हुई उस श्रेष्ठता का जो कि

दिल में एक खटके सी लगी रहती।

 

बावड़ी की इन मुंडेरों पर

मनोहर हरी कुहनी टेक

बैठी है टगर

ले पुष्प तारे-श्वेत

 

उसके पास

लाल फूलों का लहकता झौंर–

मेरी वह कन्हेर…

वह बुलाती एक खतरे की तरफ जिस ओर

अंधियारा खुला मुँह बावड़ी का

शून्य अम्बर ताकता है।

 

बावड़ी की उन गहराइयों में शून्य

ब्रह्मराक्षस एक पैठा है,

व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज,

हड़बड़ाहट शब्द पागल से।

गहन अनुमानिता

तन की मलिनता

दूर करने के लिए प्रतिपल

पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात

स्वच्छ करने–

ब्रह्मराक्षस

घिस रहा है देह

हाथ के पंजे बराबर,

बाँह-छाती-मुँह छपाछप

खूब करते साफ़,

फिर भी मैल

फिर भी मैल!!

और… होठों से

अनोखा स्तोत्र कोई क्रुद्ध मंत्रोच्चार,

अथवा शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार,

मस्तक की लकीरें

बुन रहीं

आलोचनाओं के चमकते तार!!

उस अखण्ड स्नान का पागल प्रवाह….

प्राण में संवेदना है स्याह!!

किन्तु, गहरी बावड़ी

की भीतरी दीवार पर

तिरछी गिरी रवि-रश्मि

के उड़ते हुए परमाणु, जब

तल तक पहुँचते हैं कभी

तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने

झुककर नमस्ते कर दिया।

 

पथ भूलकर जब चांदनी

की किरन टकराये

कहीं दीवार पर,

तब ब्रह्मराक्षस समझता है

वन्दना की चांदनी ने

ज्ञान गुरू माना उसे।

 

अति प्रफुल्लित कण्टकित तन-मन वही

करता रहा अनुभव कि नभ ने भी

विनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी!!

 

और तब दुगुने भयानक ओज से

पहचान वाला मन

सुमेरी-बेबिलोनी जन-कथाओं से

मधुर वैदिक ऋचाओं तक

व तब से आज तक के सूत्र छन्दस्, मन्त्र, थियोरम,

सब प्रेमियों तक

कि मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, टॉएन्बी

कि हीडेग्गर व स्पेंग्लर, सार्त्र, गाँधी भी

सभी के सिद्ध-अंतों का

नया व्याख्यान करता वह

नहाता ब्रह्मराक्षस, श्याम

प्राक्तन बावड़ी की

उन घनी गहराईयों में शून्य।

 

……ये गरजती, गूँजती, आन्दोलिता

गहराईयों से उठ रही ध्वनियाँ, अतः

उद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त में

हर शब्द निज प्रति शब्द को भी काटता,

वह रूप अपने बिम्ब से भी जूझ

विकृताकार-कृति

है बन रहा

ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ

 

बावड़ी की इन मुंडेरों पर

मनोहर हरी कुहनी टेक सुनते हैं

टगर के पुष्प-तारे श्वेत

वे ध्वनियाँ!

सुनते हैं करोंदों के सुकोमल फूल

सुनता है उन्हे प्राचीन ओदुम्बर

सुन रहा हूँ मैं वही

पागल प्रतीकों में कही जाती हुई

वह ट्रेजिडी

जो बावड़ी में अड़ गयी।

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खूब ऊँचा एक जीना साँवला

उसकी अंधेरी सीढ़ियाँ…

वे एक आभ्यंतर निराले लोक की।

एक चढ़ना औ उतरना,

पुनः चढ़ना औ लुढ़कना,

मोच पैरों में

व छाती पर अनेकों घाव।

बुरे-अच्छे-बीच का संघर्ष

वे भी उग्रतर

अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर

गहन किंचित सफलता,

अति भव्य असफलता

…अतिरेकवादी पूर्णता

की व्यथाएँ बहुत प्यारी हैं…

ज्यामितिक संगति-गणित

की दृष्टि के कृत

भव्य नैतिक मान

आत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक मान…

…अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना

कब रहा आसान

मानवी अंतर्कथाएँ बहुत प्यारी हैं!!

 

रवि निकलता

लाल चिन्ता की रुधिर-सरिता

प्रवाहित कर दीवारों पर,

उदित होता चन्द्र

व्रण पर बांध देता

श्वेत-धौली पट्टियाँ

उद्विग्न भालों पर

सितारे आसमानी छोर पर फैले हुए

अनगिन दशमलव से

दशमलव-बिन्दुओं के सर्वतः

पसरे हुए उलझे गणित मैदान में

मारा गया, वह काम आया,

और वह पसरा पड़ा है…

वक्ष-बाँहें खुली फैलीं

एक शोधक की।

 

व्यक्तित्व वह कोमल स्फटिक प्रासाद-सा,

प्रासाद में जीना

व जीने की अकेली सीढ़ियाँ

चढ़ना बहुत मुश्किल रहा।

वे भाव-संगत तर्क-संगत

कार्य सामंजस्य-योजित

समीकरणों के गणित की सीढ़ियाँ

हम छोड़ दें उसके लिए।

उस भाव तर्क व कार्य-सामंजस्य-योजन-

शोध में

सब पण्डितों, सब चिन्तकों के पास

वह गुरू प्राप्त करने के लिए

भटका!!

 

किन्तु युग बदला व आया कीर्ति-व्यवसायी

…लाभकारी कार्य में से धन,

व धन में से हृदय-मन,

और, धन-अभिभूत अन्तःकरण में से

सत्य की झाईं

निरन्तर चिलचिलाती थी।

 

आत्मचेतस् किन्तु इस

व्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन…

विश्वचेतस् बे-बनाव!!

महत्ता के चरण में था

विषादाकुल मन!

मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि

तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर

बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य

उसकी महत्ता!

व उस महत्ता का

हम सरीखों के लिए उपयोग,

उस आन्तरिकता का बताता मैं महत्व!!

 

पिस गया वह भीतरी

औ बाहरी दो कठिन पाटों बीच,

ऐसी ट्रेजिडी है नीच!!

 

बावड़ी में वह स्वयं

पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा

वह कोठरी में किस तरह

अपना गणित करता रहा

औ मर गया…

वह सघन झाड़ी के कँटीले

तम-विवर में

मरे पक्षी-सा

विदा ही हो गया

वह ज्योति अनजानी सदा को सो गयी

यह क्यों हुआ!

क्यों यह हुआ!!

मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य

होना चाहता

जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य,

उसकी वेदना का स्रोत

संगत पूर्ण निष्कर्षों तलक

पहुँचा सकूँ।

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बहुत दिनों से | गजानन माधव मुक्तिबोध 

बहुत दिनों से | गजानन माधव मुक्तिबोध  / gajanan madhav muktibodh poems
बहुत दिनों से | गजानन माधव मुक्तिबोध  / gajanan madhav muktibodh poems

मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों से

बहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना

और कि साथ यों साथ-साथ

फिर बहना बहना बहना

मेघों की आवाज़ों से

कुहरे की भाषाओं से

रंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोना

है बोल रहा धरती से

जी खोल रहा धरती से

त्यों चाह रहा कहना

उपमा संकेतों से

रूपक से, मौन प्रतीकों से

 

मैं बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातें

तुमसे चाह रहा था कहना!

जैसे मैदानों को आसमान,

कुहरे की मेघों की भाषा त्याग

बिचारा आसमान कुछ

रूप बदलकर रंग बदलकर कहे।

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बेचैन चील | गजानन माधव मुक्तिबोध

बेचैन चील!!

उस जैसा मैं पर्यटनशील

प्यासा-प्यासा,

देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील

या पानी का कोरा झाँसा

जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब

इनकार एक सूना!!

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भूल-ग़लती | गजानन माधव मुक्तिबोध

भूल-ग़लती

आज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकर

तख्त पर दिल के,

चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,

आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,

खड़ी हैं सिर झुकाए

सब कतारें

बेजुबाँ बेबस सलाम में,

अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमे

दरबारे आम में।

 

सामने

बेचैन घावों की अज़ब तिरछी लकीरों से कटा

चेहरा

कि जिस पर काँप

दिल की भाप उठती है…

पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा कद

समूचे जिस्म पर लत्तर

झलकते लाल लम्बे दाग

बहते खून के

वह क़ैद कर लाया गया ईमान…

सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,

बेख़ौफ नीली बिजलियों को फैंकता

खामोश !!

सब खामोश

मनसबदार

शाइर और सूफ़ी,

अल गजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी

आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार

हैं खामोश !!

 

नामंजूर

उसको जिन्दगी की शर्म की सी शर्त

नामंजूर हठ इनकार का सिर तान..खुद-मुख्तार

कोई सोचता उस वक्त-

छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,

सुलतानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिट्टी का,

वो-रेत का-सा ढेर-शाहंशाह,

शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा !!

(लेकिन, ना

जमाना साँप का काटा)

भूल (आलमगीर)

मेरी आपकी कमजोरियों के स्याह

लोहे का जिरहबख्तर पहन, खूँखार

हाँ खूँखार आलीजाह,

वो आँखें सचाई की निकाले डालता,

सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता

करता हमे वह घेर

बेबुनियाद, बेसिर-पैर..

हम सब क़ैद हैं उसके चमकते तामझाम में

शाही मुकाम में !!

 

इतने में हमीं में से

अजीब कराह सा कोई निकल भागा

भरे दरबारे-आम में मैं भी

सँभल जागा

कतारों में खड़े खुदगर्ज-बा-हथियार

बख्तरबंद समझौते

सहमकर, रह गए,

दिल में अलग जबड़ा, अलग दाढ़ी लिए,

दुमुँहेपन के सौ तज़ुर्बों की बुज़ुर्गी से भरे,

दढ़ियल सिपहसालार संजीदा

सहमकर रह गये !!

 

लेकिन, उधर उस ओर,

कोई, बुर्ज़ के उस तरफ़ जा पहुँचा,

अँधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों में

कहीं पर खो गया,

महसूस होता है कि यह बेनाम

बेमालूम दर्रों के इलाक़े में

(सचाई के सुनहले तेज़ अक्सों के धुँधलके में)

मुहैया कर रहा लश्कर;

हमारी हार का बदला चुकाने आयगा

संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,

हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर

प्रकट होकर विकट हो जायगा !!

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मुझे कदम-कदम पर – गजानन माधव मुक्तिबोध 

मुझे कदम-कदम पर - गजानन माधव मुक्तिबोध  / so very far poem by muktibodh
मुझे कदम-कदम पर – गजानन माधव मुक्तिबोध  / so very far poem by muktibodh

मुझे कदम-कदम पर

चौराहे मिलते हैं

बांहें फैलाए!

एक पैर रखता हूँ

कि सौ राहें फूटतीं,

मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,

बहुत अच्छे लगते हैं

उनके तजुर्बे और अपने सपने….

सब सच्चे लगते हैं,

अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,

मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,

जाने क्या मिल जाए!

 

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में

चमकता हीरा है,

हर एक छाती में आत्मा अधीरा है

प्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है,

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में

महाकाव्य पीडा है,

पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,

इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ,

अजीब है जिंदगी!

बेवकूफ बनने की खातिर ही

सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,

और यह देख-देख बडा मजा आता है

कि मैं ठगा जाता हूँ…

हृदय में मेरे ही,

प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा है

हंस-हंसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,

कि जगत…. स्वायत्त हुआ जाता है।

कहानियां लेकर और

मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते

जहां जरा खडे होकर

बातें कुछ करता हूँ

…. उपन्यास मिल जाते ।

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मुझे पुकारती हुई पुकार | गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीँ…

प्रलम्बिता अंगार रेख-सा खिंचा

अपार चर्म

वक्ष प्राण का

पुकार खो गई कहीं बिखेर अस्थि के समूह

जीवनानुभूति की गभीर भूमि में।

अपुष्प-पत्र, वक्र-श्याम झाड़-झंखड़ों-घिरे असंख्य ढूह

भग्न निश्चयों-रुंधे विचार-स्पप्न-भाव के

मुझे दिखे

अपूर्त सत्य की क्षुधित

अपूर्ण यत्न की तृषित

अपूर्त जीवनानुभूति-प्राणमूर्ति की समस्त भग्नता दिखी

(कराह भर उठा प्रसार प्राण का अजब)

समस्त भग्नता दिखी

कि ज्यों विरक्त प्रान्त में

उदास-से किसी नगर

सटर-पटर

मलीन, त्यक्त, ज़ंग-लगे कठोर ढेर–

भग्न वस्तु के समूह

चिलचिल रहे प्रचण्ड धूप में उजाड़…

दिख गए कठोर स्याह

(घोर धूप में) पहाड़

कठिन-सत्त्व भावना नपुंसका असंज्ञ के

मुझे दिखी विराट् शून्यता अशान्त काँपती

कि इस उजाड़ प्रान्त के प्रसार में रही चमक।

रहा चमक प्रसार…

फाड़ श्याम-मृत्तिका-स्तरावरण उठे सकोण

प्रस्तरी प्रतप्त अंग यत्र-तत्र-सर्वतः

कि ज्यों ढँकी वसुन्धरा-शरीर की समस्त अस्थियाँ खुलीं

रहीं चमक कि चिलचिला रही वहाँ

अचेत सूर्य की सफ़ेद औ उजाड़ धूप में।

समीरहीन ख़ैबरी

अशान्त घाटियों गई असंग राह

शुष्क पार्वतीय भूमि के उतार औ उठान की निरर्थ

उच्चता निहारती चली वितृष्ण दृष्टि से

(कि व्यर्थ उच्चता बधिर असंज्ञ यह)

उजाड़ विश्व की कि प्राण की

इसी उदास भूमि में अचक जगा

मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं।

 

दरार पड़ गई तुरत गभीर-दीर्घ

प्राण की गहन धरा प्रतप्त के

अनीर श्याम मृत्तिका शरीर में।

कि भाव स्वप्न-भार में

पुकार के अधीर व्यग्र स्पर्श से बिलख उठे

तिमिर-विविर में पड़ी अशान्त नागिनी–

छिपी हुई तृषा

अपूर्त स्वप्न-लालसा

तुरत दिखी

कि भूल-चूक धवंसिनी अवावृता हुई।

पुकार ने समस्त खोल दी छिपी प्रवंचना

कहा कि शुष्क है अथाह यह कुआँ

कि अन्धकार-अन्तराल में लगे

महीन श्याम जाल

घृण्य कीट जो कि जोड़ते दीवाल को दीवाल से

व अन्तराल को तला

अमानवी कठोर ईंट-पत्थरों से भरा हुआ

न नीर है, न पीर है, मलीन है

सदा विशून्य शुष्क ही कुआँ रहा।

विराट् झूठ के अनन्त छन्द-सी

भयावनी अशान्त पीत धुन्ध-सी

सदा अगेय

गोपनीय द्वन्द्व-सी असंग जो अपूर्त स्वप्न-लालसा

प्रवेग में उड़े सुतिक्ष्ण बाण पर

अलक्ष्य भार-सी वृथा

जगा रही विरूप चित्र हार का

सधे हुए निजत्व की अभद्र रौद्र हार-सी।

मैं उदास हाथ में

हार की प्रत्प्त रेत मल रहा

निहारता हुआ प्रचण्ड उष्ण गोल दूर के क्षितिज।

 

शून्य कक्ष की उदास

श्वासहीन, पीत-वायु शान्ति में

दिवाल पर

सचेष्ट छिपकली

अजान शब्द-शब्द ज्यों करे

कि यों अपार भाव स्वप्न-भार ये

प्रशान्ति गाढ़ में

प्रशान्ति गाढ़ से

प्रगाढ़ हो

समस्त प्राण की कथा बखानते

अधीर यन्त्र-वेग से अजीब एकरूप-तान

शब्द, शब्द, शब्द में।

 

मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं…

आज भी नवीन प्रेरणा यहाँ न मर सकी,

न जी सकी, परन्तु वह न डर सकी।

घनान्धकार के कठोर वक्ष

दंश-चिह्न-से

गभीर लाल बिम्ब प्राण-ज्योति के

गभीर लाल इन्दु-से

सगर्व भीम शान्ति में उठे अयास मुसकरा

घनान्धकार के भुजंग-बन्ध दीर्घ साँवरे

विनष्ट हो गए

प्रबुद्ध ज्वाल में हताश हो।

विशाल भव्य वक्ष से

बही अनन्त स्नेह की महान् कृतिमयी व्यथा

बही अशान्त प्राण से महान् मानवी कथा।

किसी उजाड़ प्रान्त के

विशाल रिक्त-गर्भ गुम्बजों-घिरे

विहंग जो

अधीर पंख फड़फड़ा दिवाल पर

सहायहीन, बद्ध-देह, बद्ध-प्राण

हारकर न हारते

अरे, नवीन मार्ग पा खुला हुआ

तुरन्त उड़ गए सुनील व्योम में अधीर हो।

मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई वहीं

सँवारती हुई मुझे

उठी सहास प्रेरणा।

प्रभात भैरवी जगी अभी-अभी।

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मेरा असंग बबूलपन – गजानन माधव मुक्तिबोध 

मेरा असंग बबूलपन - गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems
मेरा असंग बबूलपन – गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems

मुझे नहीं मालूम

मेरी प्रतिक्रियाएँ

सही हैं या ग़लत हैं या और कुछ

सच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्य

 

सुबह से शाम तक

मन में ही

आड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँ

अपनी ही काटपीट

ग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में कि

इतना उलझ जाता हूँ कि

जहर नहीं

लिखने की स्याही में पीता हूँ कि

नीला मुँह…

दायित्व-भावों की तुलना में

अपना ही व्यक्ति जब देखता

तो पाता हूँ कि

ख़ुद नहीं मालूम

सही हूँ या ग़लत हूँ

या और कुछ

 

सत्य हूँ कि सिर्फ़ मैं कहने की तारीफ़

मनोहर केन्द्र में

ख़ूबसूरत मजेदार

बिजली के खम्भे पर

अँगड़ाई लेते हुए मेहराबदार चार

तड़ित-प्रकाश-दीप…

खम्भे के अलँकार !!

 

सत्य मेरा अलँकार यदि, हाय

तो फिर मैं बुरा हूँ।

निजत्व तुम्हारा, प्राण-स्वप्न तुम्हारा और

व्यक्तित्व तड़ित्-अग्नि-भारवाही तार-तार

बिजली के खम्भे की भाँति ही

कन्धों पर रख मैं

विभिन्न तुम्हारे मुख-भाव कान्ति-रश्मि-दीप

निज के हृदय-प्राण

वक्ष से प्रकट, आविर्भूत, अभिव्यक्त

यदि करता हूँ तो….

दोष तुम्हारा है

 

मैंने नहीं कहा था कि

मेरी इस ज़िन्दगी के बन्द किवाड़ की

दरार से

रश्मि-सी घुसो और विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों पर

प्रत्यावर्तित होती रहो

मनोज्ञ रश्मि की लीला बन

होती हो प्रत्यावर्तित विभिन्न कोणों से

विभिन्न शीशों पर

आकाशीय मार्ग से रश्मि-प्रवाहों के

कमरे के सूने में साँवले

निज-चेतस् आलोक

 

सत्य है कि

बहुत भव्य-रम्य विशाल मृदु

कोई चीज़

कभी-कभी सिकुड़ती है इतनी कि

तुच्छ और क्षुद्र ही लगती है !!

मेरे भीतर आलोचनाशील आँख

बुद्धि की सचाई से

कल्पनाशील दृग फोड़ती !!

 

सम्वेदनशील मैं कि चिन्ताग्रस्त

कभी बहुत कुद्ध हो

सोचता हूँ

मैंने नहीं कहा था कि तुम मुझे

अपना सम्बल बना लो

मुझे नहीं चाहिए निज वक्ष कोई मुख

किसी पुष्पलता के विकास-प्रसार-हित

जाली नहीं बनूँगा मैं बाँस की

चाहिए मुझे मैं

चाहिए मुझे मेरा खोया हुए

रूखा-सूखा व्यक्तित्व

 

चाहिए मुझे मेरा पाषाण

चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन

कौन हो कि कही की अजीब तुम

बीसवीं सदी की एक

नालायक ट्रैजेडी

 

ज़माने की दुखान्त मूर्खता

फैण्टेसी मनोहर

बुदबुदाता हुआ आत्मसम्वाद

होठों का बेवकूफ़ कथ्य और

फफक-फफक ढुला अश्रुजल

 

अरी तुम षड़यन्त्र-व्यूह-जाल-फँसी हुई

अजान सब पैंतरों से बातों से

भोले विश्वास की सहजता

स्वाभाविक सौंप

यह प्राकृतिक हृदय-दान

बेसिकली ग़लत तुम।

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मेरे जीवन की | गजानन माधव मुक्तिबोध

मेरे जीवन की धर्म तुम्ही–

यद्यपि पालन में रही चूक

हे मर्म-स्पर्शिनी आत्मीये!

 

मैदान-धूप में–

अन्यमनस्का एक और

सिमटी छाया-सा उदासीन

रहता-सा दिखता हूँ यद्यपि खोया-खोया

निज में डूबा-सा भूला-सा

लेकिन मैं रहा घूमता भी

कर अपने अन्तर में धारण

प्रज्ज्वलित ज्ञान का विक्षोभी

व्यापक दिन आग बबूला-सा

मैं यद्यपि भूला-भूला सा

ज्यों बातचीत के शब्द-शोर में एक वाक्य

अनबोला-सा!

मेरे जीवन की तुम्ही धर्म

(मैं सच कह दूँ–

यद्यपि पालन में चूक रही)

नाराज़ न हो सम्पन्न करो

यह अग्नि-विधायक प्राण-कर्म

हे मर्म-स्पर्शिनी सहचारिणि!

 

था यद्यपि भूला-भूला सा

पर एक केन्द्र की तेजस्वी अन्वेष-लक्ष्य

आँखों से उर में लाखों को

अंकित करता तौलता रहा

मापता रहा

आधुनिक हँसी के सभ्य चाँद का श्वेत वक्ष

खोजता रहा उस एक विश्व

के सारे पर्वत-गुहा-गर्त

मैंने प्रकाश-चादर की मापी उस पर पीली गिरी पर्त

उस एक केन्द्र की आँखों से देखे मैंने

एक से दूसरे में घुसकर

आधुनिक भवन के सभी कक्ष

उस एक केन्द्र के ही सम्मुख

मैं हूँ विनम्र-अन्तर नत-मुख

ज्यों लक्ष्य फूल-पत्तों वाली वृक्ष की शाख

आज भी तुम्हारे वातायान में रही झाँक

सुख फैली मीठी छायाओं के सौ सुख!

 

मेरे जीवन का तुम्ही धर्म

यद्यपि पालन में रही चूक

हे मर्म-स्पर्शिनी आत्मीये!

सच है कि तुम्हारे छोह भरी

व्यक्तित्वमयी गहरी छाँहों से बहुत दूर

मैं रहा विदेशों में खोया पथ-भूला सा

अन-खोला ही

वक्ष पर रहा लौह-कवच

बाहर के ह्रास मनोमय लोभों लाभों से

हिय रहा अनाहत स्पन्दन सच,

ये प्राण रहे दुर्भेद्य अथक

आधुनिक मोह के अमित रूप अमिताभों से।

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मैं उनका ही होता – गजानन माधव मुक्तिबोध 

मैं उनका ही होता - गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems
मैं उनका ही होता – गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems

मैं उनका ही होता जिनसे

मैंने रूप भाव पाए हैं।

वे मेरे ही हिये बंधे हैं

जो मर्यादाएँ लाए हैं।

 

मेरे शब्द, भाव उनके हैं

मेरे पैर और पथ मेरा,

मेरा अंत और अथ मेरा,

ऐसे किंतु चाव उनके हैं।

 

मैं ऊँचा होता चलता हूँ

उनके ओछेपन से गिर-गिर,

उनके छिछलेपन से खुद-खुद,

मैं गहरा होता चलता हूँ।

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मैं तुम लोगों से दूर हूँ | गजानन माधव मुक्तिबोध

मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ

तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है

कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।

 

मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है,

अकेले में साहचर्य का हाथ है,

उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं

किन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिम्बित हैं, पुरस्कृत हैं

इसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है !!

सबके सामने और अकेले में।

( मेरे रक्त-भरे महाकाव्यों के पन्ने उड़ते हैं

तुम्हारे-हमारे इस सारे झमेले में )

 

असफलता का धूल-कचरा ओढ़े हूँ

इसलिए कि वह चक्करदार ज़ीनों पर मिलती है

छल-छद्म धन की

किन्तु मैं सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँ

जीवन की।

फिर भी मैं अपनी सार्थकता से खिन्न हूँ

विष से अप्रसन्न हूँ

इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए

पूरी दुनिया साफ़ करन के लिए मेहतर चाहिए

वह मेहतर मैं हो नहीं पाता

पर , रोज़ कोई भीतर चिल्लाता है

कि कोई काम बुरा नहीं

बशर्ते कि आदमी खरा हो

फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता।

रिफ्रिजरेटरों, विटैमिनों, रेडियोग्रेमों के बाहर की

गतियों की दुनिया में

मेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों में

पेटों की आँतों में न्यूनों की पीड़ा है

छाती के कोषों में रहितों की व्रीड़ा है

 

शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है

शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है

सत्य केवल एक जो कि

दुःखों का क्रम है

 

मैं कनफटा हूँ हेठा हूँ

शेव्रलेट-डॉज के नीचे मैं लेटा हूँ

तेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूँ

तुम्हारी आज्ञाएँ ढोता हूँ।

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मृत्यु और कवि | गजानन माधव मुक्तिबोध

मृत्यु और कवि | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems
मृत्यु और कवि | गजानन माधव मुक्तिबोध / muktibodh poems

घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर

व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर

है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती,

जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर

बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला,

वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीन

घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन गीला

 ये सब क्षनिक, क्षनिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर ।

ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर

जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !

इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल

भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना

इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल

अंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो तुम

जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।

क्षण-भंगुरता के इस क्षण में जीवन की गति, जीवन का स्वर

दो सौ वर्ष आयु होती तो क्या अधिक सुखी होता नर?

इसी अमर धारा के आगे बहने के हित ये सब नश्वर,

सृजनशील जीवन के स्वर में गाओ मरण-गीत तुम सुंदर

तुम कवि हो, यह फैल चले मृदु गीत निर्बल मानव के घर-घर

ज्योतित हों मुख नवम आशा से, जीवन की गति, जीवन का स्वर ।

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रात, चलते हैं अकेले ही सितारे | गजानन माधव मुक्तिबोध

रात, चलते हैं अकेले ही सितारे।

एक निर्जन रिक्त नाले के पास

मैंने एक स्थल को खोद

मिट्टी के हरे ढेले निकाले दूर

खोदा और

खोदा और

दोनों हाथ चलते जा रहे थे शक्ति से भरपूर।

सुनाई दे रहे थे स्वर –

बड़े अपस्वर

घृणित रात्रिचरों के क्रूर।

काले-से सुरों में बोलता, सुनसान था मैदान।

जलती थी हमारी लालटैन उदास,

एक निर्जन रिक्त नाले के पास।

खुद चुका बिस्तर बहुत गहरा

न देखा खोलकर चेहरा

कि जो अपने हृदय-सा

प्यार का टुकड़ा

हमारी ज़िंदगी का एक टुकड़ा,

प्राण का परिचय,

हमारी आँख-सा अपना

वही चेहरा ज़रा सिकुड़ा

पड़ा था पीत,

अपनी मृत्यु में अविभीत।

वह निर्जीव,

पर उस पर हमारे प्राण का अधिकार;

यहाँ भी मोह है अनिवार,

यहाँ भी स्नेह का अधिकार।

बिस्तर खूब गहरा खोद,

अपनी गोद से,

रक्खा उसे नरम धरती-गोद।

फिर मिट्टी,

कि फिर मिट्टी,

रखे फिर एक-दो पत्थर

उढ़ा दी मृत्तिका की साँवली चादर

हम चल पड़े

लेकिन बहुत ही फ़िक्र से फिरकर,

कि पीछे देखकर

मन कर लिया था शांत।

अपना धैर्य पृथ्वी के हृदय में रख दिया था।

धैर्य पृथ्वी का हृदय में रख लिया था।

उतनी भूमि है चिरंतन अधिकार मेरा,

जिसकी गोद में मैंने सुलाया प्यार मेरा।

आगे लालटैन उदास,

पीछे, दो हमारे पास साथी।

केवल पैर की ध्वनि के सहारे

राह चलती जा रही थी।

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लकड़ी का रावण | गजानन माधव मुक्तिबोध

दीखता

त्रिकोण इस पर्वत-शिखर से

अनाम, अरूप और अनाकार

असीम एक कुहरा,

भस्मीला अन्धकार

फैला है कटे-पिटे पहाड़ी प्रसारों पर;

लटकती हैं मटमैली

ऊँची-ऊँची लहरें

मैदानों पर सभी ओर

लेकिन उस कुहरे से बहुत दूर

ऊपर उठ

पर्वतीय ऊर्ध्वमुखी नोक एक

मुक्त और समुत्तुंग !!

उस शैल-शिखर पर

खड़ा हुआ दीखता है एक द्योः पिता भव्य

निःसंग

ध्यान-मग्न ब्रह्म…

मैं ही वह विराट् पुरुष हूँ

सर्व-तन्त्र, स्वतन्त्र, सत्-चित् !

मेरे इन अनाकार कन्धों पर विराजमान

खड़ा है सुनील

शून्य

रवि-चन्द्र-तारा-द्युति-मण्डलों के परे तक ।

दोनों हम

अर्थात्

मैं व शून्य

देख रहे…दूर…दूर…दूर तक

फैला हुआ

मटमैली जड़ीभूत परतों का

लहरीला कम्बल ओर-छोर-हीन

रहा ढाँक

कन्दरा-गुहाओं को, तालों को

वृक्षों के मैदानी दृश्यों के प्रसार को

अकस्मात्

दोनों हम

मैं वह शून्य

देखते कि कम्बल की कुहरीली लहरें

हिल रही, मुड़ रही !!

क्या यह सच,

कम्बल के भीतर है कोई जो

करवट बदलता-सा लग रहा ?

आन्दोलन ?

नहीं, नहीं मेरी ही आँखों का भ्रम है

फिर भी उस आर-पार फैले हुए

कुहरे में लहरीला असंयम !!

हाय ! हाय !

क्या है यह !! मेरी ही गहरी उसाँस में

कौन-सा है नया भाव ?

क्रमशः

कुहरे की लहरीली सलवटें

मुड़ रही, जुड़ रही,

आपस में गुँथ रही !!

क्या है यह !!

यर क्या मज़ाक है,

अरूर अनाम इस

कुहरे की लहरों से अगनित

कइ आकृति-रूप

बन रहे, बनते-से दीखते !!

कुहरीले भाफ भरे चहरे

अशंक, असंख्य व उग्र…

अजीब है,

अजीबोगरीब है

घटना का मोड़ यह ।

अचानक

भीतर के अपने से गिरा कुछ,

खसा कुछ,

नसें ढीली पड़ रही

कमज़ोरी बढ़ रही; सहसा

आतंकित हम सब

अभी तक

समुत्तुंग शिखरों पर रहकर

सुरक्षित हम थे

जीवन की प्रकाशित कीर्ति के क्रम थे,

अहं-हुंकृति के ही…यम-नियम थे,

अब क्या हुआ यह

दुःसह !!

सामने हमारे

घनीभूत कुहरे के लक्ष-मुख

लक्ष-वक्ष, शत-लक्ष-बाहु ये रूप, अरे

लगते हैं घोरतर ।

जी नहीं,

वे सिर्फ कुहरा ही नहीं है,

काले-काले पत्थर

व काले-काले लोहे के लगते वे लोग ।

हाय, हाय, कुहरे की घनीभूत प्रतिमा या

भरमाया मेरा मन,

उनके वे स्थूल हाथ

मनमाने बलशाली

लगते हैं ख़तरनाक;

जाने-पहचाने-से लगते हैं मुख वे ।

डरता हूँ,

उनमें से कोई, हाय

सहसा न चढ़ जाय

उत्तुंग शिखर की सर्वोच्च स्थिति पर,

पत्थर व लोहे के रंग का यह कुहरा !

बढ़ न जायँ

छा न जायँ

मेरी इस अद्वितीय

सत्ता के शिखरों पर स्वर्णाभ,

हमला न कर बैठे ख़तरनाक

कुहरे के जनतन्त्री

वानर ये, नर ये !!

समुदाय, भीड़

डार्क मासेज़ ये मॉब हैं,

हलचलें गड़बड़,

नीचे थे तब तक

फ़ासलों में खोये हुए कहीं दूर, पार थे;

कुहरे के घने-घने श्याम प्रसार थे ।

अब यह लंगूर हैं

हाय हाय

शिखरस्थ मुझको ये छू न जायँ !!

आसमानी शमशीरी, बिजलियों,

मेरी इन भुजाओं में बन जाओ

ब्रह्म-शक्ति !

पुच्छल ताराओं,

टूट पड़ो बरसो

कुहरे के रंग वाले वानरों के चहरे

विकृत, असभ्य और भ्रष्ट हैं…

प्रहार करो उन पर,

कर डालो संहार !!

अरे, अरे !

नभचुम्बी शिखरों पर हमारे

बढ़ते ही जा रहे

जा रहे चढ़ते

हाय, हाय,

सब ओर से घिरा हूँ ।

सब तरफ़ अकेला,

शिखर पर खड़ा हूँ ।

लक्ष-मुख दानव-सा, लक्ष-हस्त देव सा ।

परन्तु, यह क्या

आत्म-प्रतीति भी धोखा ही दे रही !!

स्वयं को ही लगता हूँ

बाँस के व कागज़ के पुट्ठे के बने हुए

महाकाय रावण-सा हास्यप्रद

भयंकर !!

हाय, हाय,

उग्रतर हो रहा चेहरों का समुदाय

और कि भाग नहीं पाता मैं

हिल नहीं पाता हूँ

मैं मन्त्र-कीलि-सा, भूमि में गड़ा-सा,

जड़ खड़ा हूँ

अब गिरा, तब गिरा

इसी पल कि उल पल…

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विचार आते हैं | गजानन माधव मुक्तिबोध 

विचार आते हैं | गजानन माधव मुक्तिबोध / gajanan madhav muktibodh poems
विचार आते हैं | गजानन माधव मुक्तिबोध / gajanan madhav muktibodh poems

विचार आते हैं

लिखते समय नहीं

बोझ ढोते वक़्त पीठ पर

सिर पर उठाते समय भार

परिश्रम करते समय

चांद उगता है व

पानी में झलमलाने लगता है

हृदय के पानी में

विचार आते हैं

लिखते समय नहीं

…पत्थर ढोते वक़्त

पीठ पर उठाते वक़्त बोझ

साँप मारते समय पिछवाड़े

बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त

पत्थर पहाड़ बन जाते हैं

नक्शे बनते हैं भौगोलिक

पीठ कच्छप बन जाती है

समय पृथ्वी बन जाता है…

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सहर्ष स्वीकारा है | गजानन माधव मुक्तिबोध

ज़िन्दगी में जो कुछ है, जो भी है

सहर्ष स्वीकारा है;

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

वह तुम्हें प्यारा है।

गरबीली ग़रीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब

यह विचार-वैभव सब

दृढ़्ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब

मौलिक है, मौलिक है

इसलिए के पल-पल में

जो कुछ भी जाग्रत है अपलक है–

संवेदन तुम्हारा है !!

जाने क्या रिश्ता है,जाने क्या नाता है

जितना भी उँड़ेलता हूँ,भर भर फिर आता है

दिल में क्या झरना है?

मीठे पानी का सोता है

भीतर वह, ऊपर तुम

मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर

मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

सचमुच मुझे दण्ड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैं

तुम्हें भूल जाने की

दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या

शरीर पर,चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं

झेलूँ मै, उसी में नहा लूँ मैं

इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित

रहने का रमणीय यह उजेला अब

सहा नहीं जाता है।

नहीं सहा जाता है।

ममता के बादल की मँडराती कोमलता–

भीतर पिराती है

कमज़ोर और अक्षम अब हो गयी है आत्मा यह

छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है

बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नही होती है !!!

सचमुच मुझे दण्ड दो कि हो जाऊँ

पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में

धुएँ के बाद्लों में

बिलकुल मैं लापता!!

लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है!!

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

या मेरा जो होता-सा लगता है, होता सा संभव है

सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव है

अब तक तो ज़िन्दगी में जो कुछ था, जो कुछ है

सहर्ष स्वीकारा है

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

वह तुम्हें प्यारा है ।

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