गोपाल सिंह नेपाली की कविता / Gopal Singh Nepali Poems In Hindi

अगर आप गोपाल सिंह नेपाली की कविताओ का पढ़ना चाहते है तो आपको बताने मे मुझे बहुत खुशी होगी की आप बिलकुल सही स्थान पर है क्योकि आपको यहॉ सभी बेहतरीन Gopal Singh Nepali Poems को आपके सामने प्रस्तुत करके आपको गोपाल सिंह की अनोखी कविताओ को चुनने और जाने का पूरा मौका देती है ।

तो चलिए बिना किसी तरह की देर किये Gopal Singh Nepali Kavita को पढ़ना शुरू करते है ।

मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ – गोपाल सिंह नेपाली

मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ - गोपाल सिंह नेपाली / गोपाल सिंह नेपाली की कविता
मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ – गोपाल सिंह नेपाली / गोपाल सिंह नेपाली की कविता

मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ

नील गगन में पंख पसारूँ;

दुःख है, तुमसे बिछड़ गया हूँ

किन्तु तुम्हारी सुधि न बिसारूँ!

 

उलझन में दुःख में वियोग में

अब तुम याद बहुत आती हो;

घनी घटा में तुमको खोजूँ

मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ;

 

जब से बिछुड़े हैं हम दोनों

मति-गति मेरी बदल गई है;

पावस में हिम में बसंत में

हँसते-रोते तुम्हें पुकारूँ!

 

तब तक मन मंदिर में मेरे

होती रहे तुम्हारी पग-ध्वनि;

तब तक उत्साहित हूँ, बाजी

इस जीवन की कभी न हारूँ!

 

तुम हो दूर दूर हूँ मैं भी

जीने की यह रीती निकालें,

तुम प्रेमी हो-प्रेम पसारो

मैं प्रेमी हूँ-जीवन वारूँ!!

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एक रुबाई | गोपाल सिंह नेपाली

अफ़सोस नहीं इसका हमको, जीवन में हम कुछ कर न सके,

झोलियाँ किसी की भर न सके, सन्ताप किसी का हर न सके,

अपने प्रति सच्चा रहने का, जीवन भर हमने काम किया,

देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके ।

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युगांतर – गोपाल सिंह नेपाली

नवीन कल्पना करो - गोपाल सिंह नेपाली / गोपाल सिंह नेपाली की कविता
नवीन कल्पना करो – गोपाल सिंह नेपाली / गोपाल सिंह नेपाली की कविता

अरे युगांतर, आ जल्दी अब खोल, खोल मेरा बंधन

बंधा हुआ इन जंजीरों से तड़प रहा कब से जीवन

देख, कटी पाँखें कैंची से उड़ सकता न जरा भी मन

भरा कान, पाँव है लंगड़ा, अँधा बना हुआ लोचन

ले जा यह तन ऐसा जीवन, बदले में दे जा यौवन

देजा उस युग का मेरा मन, बदले में लेजा सब धन

आजा ला दे कण-कण में अब फ़िर से ऐसा परिवर्तन

मरता जहाँ आज यह जीवन वहाँ करे यौवन नर्तन

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नई उमरिया प्यासी है | गोपाल सिंह नेपाली

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

उस ओर ग्राम इस ओर नगर, चंहु ओर नजरिया प्यासी है

 

रसभरी तुम्हारी वे बुंदियाँ, कुछ यहाँ गिरीं, कुछ वहाँ गिरीं

दिल खोल नहाए महल-महल, कुटिया क्या जाने, कहाँ गिरीं

इस मस्त झड़ी में घासों की, कमजोर अटरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

 

जंजीर कभी तड़का-तड़का, तकदीर जगाई थी हमने

हर बार बदलते मौसम पर, उम्मीद लगाई थी हमने

जंजीर कटी, तकदीर खुली, पर अभी नगरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

 

धरती प्यासी, परती प्यासी, प्यासी है आस लगी खेती

जब ताल तलैया भी सूखी, क्या पाए प्यास लगी रेती

बागों की चर्चा कौन करे, अब यहाँ डगरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

 

मुस्लिम के होंठ कहीं प्यासे, हिंदू का कंठ कहीं प्यासा

मन्दिर-मस्ज़िद-गुरूद्वारे में, बतला दो कौन नहीं प्यासा

चल रही चुराई हुई हँसी, पर सकल बजरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

 

बोलो तो श्याम घटाओं ने, अबकी कैसा चौमास रचा

पानी कहने को थोड़ा सा, गंगा-जमुना के पास बचा

इस पार तरसती है गैया, उस पार गुजरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

 

जो अभी पधारे हैं उनका, सुनहरा सबेरा प्यासा है

जो कल जाने वाले उनका भी रैन-बसेरा प्यासा है

है भरी जवानी जिन-जिनकी, उनकी दुपहरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

 

कहने को बादल बरस रहे, सदियों से प्यासे तरस रहे

ऐसे बेदर्द ज़माने में, क्या मधुर रहे, क्या सरस रहे

कैसे दिन ये पानी में भी, हर एक मछरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

 

यह पीर समझने को तुम भी, घनश्याम कभी प्यासे तरसो

या तो ना बरसो, बरसो तो, चालीस करोड़ पर बरसो

क्या मौसम है जल छलक रहा, पर नई उमरिया प्यासी है

घनश्याम कहाँ जाकर बरसे, हर घाट गगरिया प्यासी है

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आ रहे तुम बनकर मधुमास – गोपाल सिंह नेपाली

आ रहे तुम बनकर मधुमास - गोपाल सिंह नेपाली  / gopal singh nepali ki kavita
आ रहे तुम बनकर मधुमास – गोपाल सिंह नेपाली  / gopal singh nepali ki kavita

आ रहे तुम बन कर मधुमास

और मैं ऋतु का पहला फूल

 

घने तुम काले-काले मेघ उठे

हो आज बाँच कर दुन्द

और मैं उठा पवन से सिहर

थिरकता धारों पर जल बुन्द

बने तुम गगन गगन मुख चन्द्र

चंद्र की किरण रेशमी डोर

और मैं तुम्हें देखने बना मुग्ध

दो नयन-नयन की कोर

सबल तुम आगे बढ़ते चरण

और मैं पीछे पड़ती धूल

 

तरुण तुम अरुण किरण का वाण

कठिन मैं अन्धकार का मर्म

मधुर तुम मधुपों की गुंजार और

मैं खिली कली की शर्म

दूर की तुम धीमी आवाज़

गूँजती जो जग के इस पार

रात की मैं हूँ टूटी नींद

नींद का बिखर गया संसार

चपल तुम बढ़ती आती लहर

और मैं डूब गया उपकूल

 

सुभग तुम झिलमिल-झिलमिल प्रातः

प्रातः का मन्द मधुर कलहास

गहन मैं थकी झुटपुटी साँझ

उतरती तरु कुंजों के पास

सघन तुम हरा-भरा वन कुञ्ज

कुञ्ज का मैं गायक खल बाल

तुम्हारा जीवन मेरा गान

और मेरा जीवन तरु डाल

पुरुष तुम फैला देते बाँह

प्रकृति मैं जाती उन पर झूल

 

प्रवल तुम तेज पवन की फूँक

फूँक से उठा हुआ तूफ़ान

और मैं थरथर कम्पित दीप

दीप से झाँक रहा निर्वाण

कुशल तुम कवि कुल कण्ठाभरण

और मैं एक तुम्हारा छन्द

जन्म तुम बनने का शृंगार

मरण मैं मिटने का आनन्द

सरल तुम प्रथम बार का ज्ञान

और मैं बार-बार की भूल

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बाबुल तुम बगिया के तरुवर – गोपाल सिंह नेपाली

बाबुल तुम बगिया के तरुवर - गोपाल सिंह नेपाली
बाबुल तुम बगिया के तरुवर – गोपाल सिंह नेपाली / gopal singh nepali ki kavita

बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रे

दाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें, ज्यों मोती की लडियां रे

बाबुल तुम बगिया के तरुवर …….

 

आँखों से आँसू निकले तो पीछे तके नहीं मुड़के

घर की कन्या बन का पंछी, फिरें न डाली से उड़के

बाजी हारी हुई त्रिया की

जनम -जनम सौगात पिया की

बाबुल तुम गूंगे नैना, हम आँसू की फुलझड़ियाँ रे

उड़ जाएँ तो लौट न आएँ ज्यों मोती की लडियाँ रे

 

हमको सुध न जनम के पहले , अपनी कहाँ अटारी थी

आँख खुली तो नभ के नीचे , हम थे गोद तुम्हारी थी

ऐसा था वह रैन -बसेरा

जहाँ सांझ भी लगे सवेरा

बाबुल तुम गिरिराज हिमालय , हम झरनों की कड़ियाँ रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

छितराए नौ लाख सितारे , तेरी नभ की छाया में

मंदिर -मूरत , तीरथ देखे , हमने तेरी काया में

दुःख में भी हमने सुख देखा

तुमने बस कन्या मुख देखा

बाबुल तुम कुलवंश कमल हो , हम कोमल पंखुड़ियां रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

बचपन के भोलेपन पर जब , छिटके रंग जवानी के

प्यास प्रीति की जागी तो हम , मीन बने बिन पानी के

जनम -जनम के प्यासे नैना

चाहे नहीं कुंवारे रहना

बाबुल ढूंढ फिरो तुम हमको , हम ढूंढें बावरिया रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

चढ़ती उमर बढ़ी तो कुल -मर्यादा से जा टकराई

पगड़ी गिरने के दर से , दुनिया जा डोली ले आई

मन रोया , गूंजी शहनाई

नयन बहे , चुनरी पहनाई

पहनाई चुनरी सुहाग की , या डाली हथकड़ियां रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

मंत्र पढ़े सौ सदी पुराने , रीत निभाई प्रीत नहीं

तन का सौदा कर के भी तो , पाया मन का मीत नहीं

गात फूल सा , कांटे पग में

जग के लिए जिए हम जग में

बाबुल तुम पगड़ी समाज के , हम पथ की कंकरियां रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

मांग रची आंसू के ऊपर , घूंघट गीली आँखों पर

ब्याह नाम से यह लीला ज़ाहिर करवाई लाखों पर

 

नेह लगा तो नैहर छूता , पिया मिले बिछुड़ी सखियाँ

प्यार बताकर पीर मिली तो नीर बनीं फूटी अंखियाँ

हुई चलाकर चाल पुरानी

नयी जवानी पानी पानी

चली मनाने चिर वसंत में , ज्यों सावन की झाड़ियाँ रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

देखा जो ससुराल पहुंचकर , तो दुनिया ही न्यारी थी

फूलों सा था देश हरा , पर कांटो की फुलवारी थी

कहने को सारे अपने थे

पर दिन दुपहर के सपने थे

मिली नाम पर कोमलता के , केवल नरम कांकरिया रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

वेद-शास्त्र थे लिखे पुरुष के , मुश्किल था बचकर जाना

हारा दांव बचा लेने को , पति को परमेश्वर जाना

दुल्हन बनकर दिया जलाया

दासी बन घर बार चलाया

माँ बनकर ममता बांटी तो , महल बनी झोंपड़िया रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

मन की सेज सुला प्रियतम को , दीप नयन का मंद किया

छुड़ा जगत से अपने को , सिंदूर बिंदु में बंद किया

जंजीरों में बाँधा तन को

त्याग -राग से साधा मन को

पंछी के उड़ जाने पर ही , खोली नयन किवाड़ियाँ रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

जनम लिया तो जले पिता -माँ , यौवन खिला ननद -भाभी

ब्याह रचा तो जला मोहल्ला , पुत्र हुआ तो बंध्या भी

जले ह्रदय के अन्दर नारी

उस पर बाहर दुनिया सारी

मर जाने पर भी मरघट में , जल – जल उठी लकड़ियाँ रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

 

जनम -जनम जग के नखरे पर , सज -धजकर जाएँ वारी

फिर भी समझे गए रात -दिन हम ताड़न के अधिकारी

पहले गए पिया जो हमसे अधम बने हम यहाँ अधम से

पहले ही हम चल बसें , तो फिर जग बाटें रेवड़ियां रे

उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे

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भाई – बहन | गोपाल सिंह नेपाली

तू चिंगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूँ,

तू बन जा हहराती गँगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,

आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,

तू भगिनी बन क्रान्ति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ,

यहाँ न कोई राधारानी, वृन्दावन, बंशीवाला,

…तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला ।

 

बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं, तू ममता की गोद बनी,

मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी,

मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,

भाई की गति, मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनी

यह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना ।

जननी की जंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना ।

 

भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,

संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,

यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,

यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,

पागल घडी, बहन-भाई है, वह आज़ाद तराना है ।

मुसीबतों से, बलिदानों से, पत्थर को समझाना है ।

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नवीन कल्पना करो – गोपाल सिंह नेपाली

निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए

तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,

तुम कल्पना करो।

 

अब देश है स्वतंत्र, मेदिनी स्वतंत्र है

मधुमास है स्वतंत्र, चाँदनी स्वतंत्र है

हर दीप है स्वतंत्र, रोशनी स्वतंत्र है

अब शक्ति की ज्वलंत दामिनी स्वतंत्र है

 

लेकर अनंत शक्तियाँ सद्य समृद्धि की-

तुम कामना करो, किशोर कामना करो,

तुम कल्पना करो।

 

तन की स्वतंत्रता चरित्र का निखार है

मन की स्वतंत्रता विचार की बहार है

घर की स्वतंत्रता समाज का सिंगार है

पर देश की स्वतंत्रता अमर पुकार है

 

टूटे कभी न तार यह अमर पुकार का-

तुम साधना करो, अनंत साधना करो,

तुम कल्पना करो।

 

हम थे अभी-अभी गुलाम, यह न भूलना

करना पड़ा हमें सलाम, यह न भूलना

रोते फिरे उमर तमाम, यह न भूलना

था फूट का मिला इनाम, वह न भूलना

 

बीती गुलामियाँ, न लौट आएँ फिर कभी

तुम भावना करो, स्वतंत्र भावना करो

तुम कल्पना करो।

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दीपक जलता रहा रातभर | गोपाल सिंह नेपाली

 

तन का दिया, प्राण की बाती,

दीपक जलता रहा रात-भर ।

 

दु:ख की घनी बनी अँधियारी,

सुख के टिमटिम दूर सितारे,

उठती रही पीर की बदली,

मन के पंछी उड़-उड़ हारे ।

 

बची रही प्रिय की आँखों से,

मेरी कुटिया एक किनारे,

मिलता रहा स्नेह रस थोडा,

दीपक जलता रहा रात-भर ।

 

दुनिया देखी भी अनदेखी,

नगर न जाना, डगर न जानी;

रंग देखा, रूप न देखा,

केवल बोली ही पहचानी,

 

कोई भी तो साथ नहीं था,

साथी था ऑंखों का पानी,

सूनी डगर सितारे टिमटिम,

पंथी चलता रहा रात-भर ।

 

अगणित तारों के प्रकाश में,

मैं अपने पथ पर चलता था,

मैंने देखा, गगन-गली में,

चाँद-सितारों को छलता था ।

 

आँधी में, तूफ़ानों में भी,

प्राण-दीप मेरा जलता था,

कोई छली खेल में मेरी,

दिशा बदलता रहा रात-भर ।

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सरिता – गोपाल सिंह नेपाली

सरिता - गोपाल सिंह नेपाली / गोपाल सिंह नेपाली की कविता
सरिता – गोपाल सिंह नेपाली / गोपाल सिंह नेपाली की कविता

यह लघु सरिता का बहता जल

कितना शीतल¸ कितना निर्मल¸

 

हिमगिरि के हिम से निकल–निकल¸

यह विमल दूध–सा हिम का जल¸

कर–कर निनाद कल–कल¸ छल–छल

बहता आता नीचे पल पल

 

तन का चंचल मन का विह्वल।

यह लघु सरिता का बहता जल।।

 

निर्मल जल की यह तेज़ धार

करके कितनी श्रृंखला पार

बहती रहती है लगातार

गिरती उठती है बार बार

 

रखता है तन में उतना बल

यह लघु सरिता का बहता जल।।

 

एकांत प्रांत निर्जन निर्जन

यह वसुधा के हिमगिरि का वन

रहता मंजुल मुखरित क्षण क्षण

लगता जैसे नंदन कानन

 

करता है जंगल में मंगल

यह लघु सरित का बहता जल।।

 

ऊँचे शिखरों से उतर–उतर¸

गिर–गिर गिरि की चट्टानों पर¸

कंकड़–कंकड़ पैदल चलकर¸

दिन–भर¸ रजनी–भर¸ जीवन–भर¸

 

धोता वसुधा का अन्तस्तल।

यह लघु सरिता का बहता जल।।

 

मिलता है उसको जब पथ पर

पथ रोके खड़ा कठिन पत्थर

आकुल आतुर दुख से कातर

सिर पटक पटक कर रो रो कर

 

करता है कितना कोलाहल

यह लघु सरित का बहता जल।।

 

हिम के पत्थर वे पिघल–पिघल¸

बन गये धरा का वारि विमल¸

सुख पाता जिससे पथिक विकल¸

पी–पीकर अंजलि भर मृदु जल¸

 

नित जल कर भी कितना शीतल।

यह लघु सरिता का बहता जल।।

 

कितना कोमल¸ कितना वत्सल¸

रे! जननी का वह अन्तस्तल¸

जिसका यह शीतल करूणा जल¸

बहता रहता युग–युग अविरल¸

 

गंगा¸ यमुना¸ सरयू निर्मल

यह लघु सरिता का बहता जल।

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यह दिया बुझे नहीं | गोपाल सिंह नेपाली

घोर अंधकार हो,

चल रही बयार हो,

आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं

यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है ।

 

शक्ति का दिया हुआ,

शक्ति को दिया हुआ,

भक्ति से दिया हुआ,

यह स्वतंत्रता–दिया,

रूक रही न नाव हो

जोर का बहाव हो,

आज गंग–धार पर यह दिया बुझे नहीं,

यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है ।

 

यह अतीत कल्पना,

यह विनीत प्रार्थना,

यह पुनीत भावना,

यह अनंत साधना,

शांति हो, अशांति हो,

युद्ध¸ संधि¸ क्रांति हो,

तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं,

देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है ।

 

तीन–चार फूल है,

आस–पास धूल है,

बांस है –बबूल है,

घास के दुकूल है,

वायु भी हिलोर दे,

फूंक दे¸ चकोर दे,

कब्र पर मजार पर, यह दिया बुझे नहीं,

यह किसी शहीद का पुण्य–प्राण दान है।

 

झूम–झूम बदलियाँ

चूम–चूम बिजलियाँ

आंधिया उठा रहीं

हलचलें मचा रहीं

लड़ रहा स्वदेश हो,

यातना विशेष हो,

क्षुद्र जीत–हार पर¸ यह दिया बुझे नहीं,

यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है ।

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उस पार – गोपाल सिंह नेपाली

उस पार - गोपाल सिंह नेपाली / gopal singh nepali poems
उस पार – गोपाल सिंह नेपाली / gopal singh nepali poems

उस पार कहीं बिजली चमकी होगी

जो झलक उठा है मेरा भी आँगन ।

 

उन मेघों में जीवन उमड़ा होगा

उन झोंकों में यौवन घुमड़ा होगा

उन बूँदों में तूफ़ान उठा होगा

कुछ बनने का सामान जुटा होगा

उस पार कहीं बिजली चमकी होगी

जो झलक उठा है मेरा भी आँगन ।

 

तप रही धरा यह प्यासी भी होगी

फिर चारों ओर उदासी भी होगी

प्यासे जग ने माँगा होगा पानी

करता होगा सावन आनाकानी

उस ओर कहीं छाए होंगे बादल

जो भर-भर आए मेरे भी लोचन ।

 

मैं नई-नई कलियों में खिलता हूँ

सिरहन बनकर पत्तों में हिलता हूँ

परिमल बनकर झोंकों में मिलता हूँ

झोंका बनकर झोंकों में मिलता हूँ

उस झुरमुट में बोली होगी कोयल

जो झूम उठा है मेरा भी मधुबन ।

 

मैं उठी लहर की भरी जवानी हूँ

मैं मिट जाने की नई कहानी हूँ

मेरा स्वर गूँजा है तूफ़ानों में

मेरा जीवन आज़ाद तरानों में

ऊँचे स्वर में गरजा होगा सागर

खुल गए भँवर में लहरों के बंधन ।

 

मैं गाता हूँ जीवन की सुंदरता

यौवन का यश भी मैं गाया करता

मधु बरसाती मेरी वाणी-वीणा

बाँटा करती समता-ममता-करुणा

पर आज कहीं कोई रोया होगा

जो करती वीणा क्रंदन ही क्रंदन ।

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हिमालय और हम | गोपाल सिंह नेपाली

गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।

 

(1)

इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही ।

पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही ।।

अंबर में सिर, पाताल चरण

मन इसका गंगा का बचपन

तन वरण-वरण मुख निरावरण

इसकी छाया में जो भी है, वह मस्‍तक नहीं झुकाता है ।

ग‍िरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।।

 

(2)

अरूणोदय की पहली लाली इसको ही चूम निखर जाती ।

फिर संध्‍या की अंतिम लाली इस पर ही झूम बिखर जाती ।।

इन शिखरों की माया ऐसी

जैसे प्रभात, संध्‍या वैसी

अमरों को फिर चिंता कैसी ?

इस धरती का हर लाल खुशी से उदय-अस्‍त अपनाता है ।

गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।।

 

(3)

हर संध्‍या को इसकी छाया सागर-सी लंबी होती है ।

हर सुबह वही फिर गंगा की चादर-सी लंबी होती है ।।

इसकी छाया में रंग गहरा

है देश हरा, प्रदेश हरा

हर मौसम है, संदेश भरा

इसका पद-तल छूने वाला वेदों की गाथा गाता है ।

गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।।

 

(4)

जैसा यह अटल, अडिग-अविचल, वैसे ही हैं भारतवासी ।

है अमर हिमालय धरती पर, तो भारतवासी अविनाशी ।।

कोई क्‍या हमको ललकारे

हम कभी न हिंसा से हारे

दु:ख देकर हमको क्‍या मारे

गंगा का जल जो भी पी ले, वह दु:ख में भी मुसकाता है ।

गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।।

 

(5)

टकराते हैं इससे बादल, तो खुद पानी हो जाते हैं ।

तूफ़ान चले आते हैं, तो ठोकर खाकर सो जाते हैं ।

जब-जब जनता को विपदा दी

तब-तब निकले लाखों गाँधी

तलवारों-सी टूटी आँधी

इसकी छाया में तूफ़ान, चिरागों से शरमाता है।

गिरिराज, हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।

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प्रार्थना बनी रही – गोपाल सिंह नेपाली 

प्रार्थना बनी रही - गोपाल सिंह नेपाली / gopal singh nepali ki kavita
प्रार्थना बनी रही – गोपाल सिंह नेपाली / gopal singh nepali ki kavita

रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही

एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का

पर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर का

राज है ग़रीब का ताज दानवीर का

तख़्त भी पलट गया कामना गई नहीं

रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही

 

चूम कर जिन्हें सदा क्राँतियाँ गुज़र गईं

गोद में लिये जिन्हें आँधियाँ बिखर गईं

पूछता ग़रीब वह रोटियाँ किधर गई

देश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहीं

रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही

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गरीब का सलाम ले | गोपाल सिंह नेपाली

 

कर्णधार तू बना तो हाथ में लगाम ले

क्रांति को सफल बना नसीब का न नाम ले

भेद सर उठा रहा, मनुष्य को मिटा रहा,

गिर रहा समाज , आज बाजुओं में थाम ले

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

लोग आस में खड़े गली गली के मोड़ पर

एक का विचार छोड़, दृष्टि दे करोड़ पर

अन्यथा प्रतीति बढ़ रही है तोड़-फोड़ पर,

न्याय भी हमें मिले कि नीति भी नहीं हिले

प्यार है मनुष्य से तो रौशनी से काम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

आँख बन के फूटती न आँसुओं की फुलझड़ी

टूटती कहाँ से फिर गुलामियों की हथकड़ी,

साँस तोड़ती महल से दूर-दूर झोंपड़ी,

किंतु अब स्वराज है, प्रजा के सिर पे ताज है

छाँव दे जहान को, तू अपने सिर पे घाम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

यह स्वतंत्रता नहीं, कि एक तो अमीर हो,

दूसरा मनुष्य तो रहे मगर फ़कीर हो,

न्याय हो तो आर-पार एक ही लकीर हो,

वर्ग की तनातनी, न मानती है चाँदनी,

चाँदनी लिए चला तो घूम हर मुकाम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

कर भला गरीब का तो डर न साम्यवाद से,

नाश है प्रयोगवाद का प्रयोगवाद से,

तू स्वतंत्र देश को बचा सदा विवाद से,

यों नई दिशा दिखा, कि दीप की हँसे शिखा,

साम्यवाद भी मिले, तो चूम ग्राम-ग्राम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

जी रहे जहान में, खान-पान चाहिए,

नित निवास के लिए हमें मकान चाहिए,

चाहिए हज़ार सुख मगर न दान चाहिए,

फूल साम्य का खिला, कुटीर से महल मिला,

घर बसा करोड़ का, करोड़ का प्रणाम ले–

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

राम राज्य है तो मुफ़्त में मिला करे दवा,

मुफ़्त तो पढ़ा करें कि जैसे मुफ्त है हवा,

न्याय मुफ़्त में मिले, बिहार हो कि मालवा,

यों हमें उबार तो, समाज को सिंगार तो,

कोटि-कोटि के हृदय में कर सदैव धाम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

शक्ति है मिली तो स्वाद-दीन हीन को मिले,

वह मिले कुली-कुली को जो कुलीन को मिले,

सूर्य व्योम को मिले, किरन ज़मीन को मिले,

शक्ति यों पसार दे, व्यक्ति दुःख बिसार दे,

प्यार का हज़ार बार प्यार ही इनाम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

ज़िन्दगी में ज़िन्दगी प्रताप की उतार ले,

बाजुओं में बल अमर हम्मीर का उधार ले,

बुद्धि ले तो अपने ही शिवाजी से उधार ले,

कर्णधार है तो चल, दरिद्र की दिशा बदल,

देश को अमर बना के उम्र कर तमाम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

यह न कर सके अगर तो तख़्त ताज छोड़ दे,

और के लिए जगह बना, मिज़ाज छोड़ दे,

छोड़ना है कल तुझे हठीले आज छोड़ दे,

आके मिल समाज में कि भाग ले स्वराज में

शांति भोग, किंतु बागडोर से विराम ले,

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

 

रहनुमा बने बिना भी उम्र बीत जाएगी,

ताज-तख़्त के बिना भी प्रीति गीत गाएगी,

कोकिला कहीं रहे, वसंत गीत गाएगी,

रास्ता दे भीड़ को, सँवार अपने नीड़ को,

पीपलों की छाँव में, तू बैठ राम-नाम ले–

त्याग का न दाम ले,

दे बदल नसीब तो गरीब का सलाम ले!

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हिमालय ने पुकारा | गोपाल सिंह नेपाली

 

शंकर की पुरी, चीन ने सेना को उतारा

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा

हो जाय पराधीन नहीं गंग की धारा

गंगा के किनारों ने शिवालय को पुकारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

अम्बर के तले हिन्द की दीवार हिमालय

सदियों से रहा शांति की मीनार हिमालय

अब मांग रहा हिन्द से तलवार हिमालय

भारत की तरफ चीन ने है पाँव पसारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

हम भाई समझते जिसे दुनिया से उलझ के

वह घेर रहा आज हमें बैरी समझ के

चोरी भी करे और करे बात गरज के

बर्फों में पिघलने को चला लाल सितारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

धरती का मुकुट आज खड़ा डोल रहा है

इतिहास में अध्याय नया खोल रहा है

घायल है, अहिंसा का वज़न तोल रहा है

धोखे से गया छूट भाई-भाई का नारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

है भूल हमारी, वह छुरी क्यों न निकाले

तिब्बत को अगर चीन के करते न हवाले

पड़ते न हिमालय के शिखर चोर के पाले

समझा न सितारों ने घटाओं का इशारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

ओ बात के बलवान! अहिंसा के पुजारी!

बातों की नहीं आज तेरी आन की बारी

बैठा ही रहा तू तो गयी लाज हमारी

खा जाय कहीं जंग नहीं खड़ग दुधारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

जागो कि बचाना है तुम्हें मानसरोवर

रख ले न कोई छीन के कैलाश मनोहर

ले ले न हमारी यह अमरनाथ धरोहर

उजड़े न हिमालय तो अचल भाग्य तुम्हारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

इतिहास पढो, समझो तो मिलती है ये शिक्षा

होती न अहिंसा से कभी देश की रक्षा

क्या लाज रही जबकि मिली प्राण की भिक्षा

यह हिन्द शहीदों का अमर देश है प्यारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

भूला है पडोसी तो उसे प्यार से कह दो

लम्पट है, लुटेरा है तो ललकार से कह दो

जो मुंह से कहा है वही तलवार से कह दो

आये न कभी लूटने भारत को दुबारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

कह दो कि हिमालय तो क्या पत्थर भी न देंगे

लद्दाख की तो बात क्या बंजर भी न देंगे

आसाम हमारा है रे! मर कर भी न देंगे

है चीन का लद्दाख तो तिब्बत है हमारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

 

भारत से तुम्हें प्यार है तो सेना को हटा लो

भूटान की सरहद पर बुरी दृष्टि न डालो

है लूटना सिक्किम को तो पेकिंग को संभालो

आज़ाद है रहना तो करो घर में गुज़ारा।

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

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