जिन्दगी की भागदौड़ ( चूहा दौड़ क्या है ?)

चूहा दौड़ क्या है ?

“ एक दुसरे से आगे बढ़ने के लिए अन्धा-धुन दौड़, कड़ी प्रतियोगिता, तेज दौड़ा-दौड़ी, चूहा दौड़ कहलाता है ”

जरा ठहरे, अभी आपने जो परिभाषा पढ़ी है वो तो केवल एक परिभाषा है इन चूहा दौड़ मे फसे लोगो का जीवन भी देख लीजियें। आप देखकर दंग रह जायेगे एक साधारण आदमी अपना पूरा जीवन किन चीजो मे गवा देता है।

बहुत मजा आने वाला है तो चलिये शुरू करते है शुरूवात से-

चुहा दौड़ मे फसे व्यक्ति का जीवन ( साधारण जीवन )

अगर आप किसी भी औसत रूप से शिक्षित, कड़ी मेहनत करने वाले आदमी की जिन्दगी को देखे, तो उसके जीवन में एक-सा ही सफर मिलेगा।

बच्चा पैदा होता है । स्कूल जाता है। माता-पिता खुश हो जाते है। क्योकि बच्चे को स्कूल मे अच्छे नम्बर मिलते है और उसका दाखिला कॉलेज मे हो जाता है।

बच्चा स्नातक हो जाता है और फिर योजना के अनुसार काम करता है वह किसी आसान सुरक्षित नौकरी या करियर की तलाश करता है और बच्चे को ऐसा ही काम मिल जाता है।

शायद वह डॉक्टर या वकील बन जाता है या वह सेना मे भर्ती हो जाता है या फिर वह सरकारी नौकरी करने लगता है।

बच्चा पैसा कमाने लगता है, उसके पास थोक मे क्रेडिट कार्ड आने लगते है और अगर अब तक उसने खरीदारी करना शुरू नही किया है तो अब जमकर खरीदारी शुरू हो जाती है।

“ खर्च करने के लिए पैसे पास मे होते है तो वह उन जगहो पर जाता है जहॉ उसके उम्र के ज्यादातर जवान जाते है और लोगो से मिलते है, डेटिंग करते है और कभी-कभार शादी भी कर लेते है।

अब जिन्दगी मे मजा आ जाता है क्योकि आज-कल पुरूष और महिलाये दोनो नौकरी करते है उन्हे अपना भविष्य सुनहारा नजर आता है अब वे घर, कार, टेलीविजन खरीदने का फैसला करते है, छुट्टीयाँ मनाने कही चले जाते है और फिर उनके बच्चे हो जाते है।

बच्चो के साथ उनके खर्चे भी बढ़ जाते है। खुशहाल पति-पत्नि सोचते है कि ज्यादा पैसा कमाने के लिए उन्हे ज्यादा मेहनत करनी चाहिऐ।

उनका करियर अब उनके लिए अब पहले से ज्यादा मायने रखता है। वे अपने काम मे ज्यादा मेहनत करने लगते है ताकि उन्हे प्रमोशन मिल जाये या उनकी तनख्वा बढ़ जाये। तनख्वा बढ़ती है पर उसके साथ ही दुसरा बच्चा पैदा हो जाता है। ”

अब उन्हे एक बड़े घर की जरूरत महसूस होती है।

वे नौकरी मे और भी ज्यादा मेहनत करते है। बेहतर कर्मचारी बन जाते है और ज्यादा मन लगाकर काम करने लगते है। ज्यादा विशेषज्ञता हासिल करने के लिए वे एक बार फिर किसी स्कूल मे जाते है ताकि वे ज्यादा पैसे कमा सके।

हो सकता है कि वे कोई दूसरा काम भी खोज ले। उनकी आमदनी बढ़ जाती है परंतु उस आमदनी पर उन्हे इनकम टैक्स भी चुकाना पड़ता है।

यही नही, उन्होने जो बड़ा घर खरीदा है उस पर भी टैक्स देना होता है। इसके अलावा उन्हे समाजिक सुरक्षा का टैक्स तो चुकाना ही है, इसी तरह बहुत से टैक्स चुकाते-चुकाते उनकी तनख्वा चुक जाती है वे अपनी बढ़ी हुई तनख्वा लेकर घर आते है और हैरान होते है की इतना सारा पैसा आखिर कहॉ चला जाता है।

भविष्य के लिए बचत के हिसाब से वे कुछ म्युचुवल फन्ड भी खरीद लेते है और अपने क्रेडिट कार्ड से घर का किराना खरीदते है।

उनके बच्चो की उम्र अब पाच से छः साल हो जाती है। यह चिन्ता भी उन्हे सताने लगती है कि बच्चो के कॉलेज की शिक्षा के लिए भी बचत जरूरी है इसके साथ ही उन्हे अपने रिटायरमेन्ट के लिए पैसा बचाने की चिन्ता भी सताने लगती है।

“ 35 साल पहले पैदा हुऐ यह खुशहाल दम्पत्ति अब अपनी नौकरी के बाकी दिन चूहा दौड़ मे फस कर बिताते है, वे अपनी कम्पनी के मालिको के लिए काम करते है, सरकार को टैक्स चुकाने के लिए काम करते है, और बैंक मे अपनी गिरवी सम्पत्ति तथा क्रेडिट कार्ड के कर्ज को चुकाने के लिए काम करते है। ”

“ फिर वे अपने बच्चो को यह सलाह देते है की उन्हे मन लगाकर पढ़ना चाहिऐ , अच्छे नम्बर लाने चाहिऐ और किसी सुरक्षित नौकरी की तलाश करनी चाहिऐ। वे पैसे के बारे मे कुछ भी नही सिखते और इसलिए वे जिन्दगी भर कड़ी मेहनत करते रहते है। यह प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है इसे ‘चूहा दौड़’ कहते है। ”

हमे पैसे की शिक्षा नही दी जाती है इसलिए आज अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और गरीब होता जा रहा है और मीडिल क्लास कर्ज मे डूबा है।

Note- अगर आपको लगता है स्कूल व कॉलेज के मिले Marks व्यक्ति को सफल बनाते है तो आप गलत है, स्कूल के Marks व्यक्ति को नौकर बनाती है। क्योकि स्कूल बने ही नौकर पैदा करने के लिए है !!!

अगर आपको इन सच्चाई को जानकर बुरा नही लगा तो आप उन कुछ चन्द लोगो मे से है जो सच्चाई को स्वीकार करना जानते है। और या तो आप अपने जीवन मे सफल हो चुके है या सफलता के राह पर है।

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