कबीर दास की कविताएँ / Kabir Das Poems in Hindi

आज महानतम् कवि कबीर दास की कविताओ पर प्रकाश डालने वाले है । इस पोस्ट मे नीचे आपको सभी Famous Kabir Das Poems मिलेंगी जिन्हे आप पढ़ सकते है ।

तो चलिए बिना किसी तरह की देर किये Short Kabir Das Poems in Hindi की शुरूवात करते है ।

कबीर की साखियाँ / कबीर दास

कबीर की साखियाँ / कबीर दास की कविताएँ
कबीर दास की कविताएँ

कस्तूरी कुँडली बसै, मृग ढूँढे बन माहिँ।

 ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहिँ॥

 

 प्रेम ना बाड़ी उपजे, प्रेम ना हाट बिकाय।

 राजा परजा जेहि रुचे, सीस देई लै जाय॥

 

 माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर।

 कर का मन का छाड़ि के, मन का मनका फेर॥

 

 माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया सरीर।

 आसा तृष्णा ना मुई, यों कह गये कबीर॥

 

 झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।

 खलक चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद॥

 

 वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर।

 परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर॥

 

 साधु बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय।

 तपन बुझावे और की, अपनो पारस लाय॥

 

 सोना, सज्जन, साधु जन, टुटी जुड़ै सौ बार।

 दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धकै दरार॥

 

 जिहिं धरि साध न पूजिए, हरि की सेवा नाहिं।

 ते घर मरघट सारखे, भूत बसै तिन माहिं॥

 

 मूरख संग ना कीजिए, लोहा जल ना तिराइ।

 कदली, सीप, भुजंग-मुख, एक बूंद तिहँ भाइ॥

 

 तिनका कबहुँ ना निन्दिए, जो पायन तले होय।

 कबहुँ उड़न आँखन परै, पीर घनेरी होय॥

 

 बोली एक अमोल है, जो कोइ बोलै जानि।

 हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि॥

 

 ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।

 औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होय॥

 

 लघुता ते प्रभुता मिले, प्रभुता ते प्रभु दूरी।

 चींटी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी॥

 

 निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।

 बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥

 

 मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।

 मुकताहल मुकता चुगै, अब उड़ि अनत ना जाहिं॥ Go To List ↑

 


कथनी-करणी का अंग / कबीर दास

कथनी-करणी का अंग / kabir poems
kabir poems

जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल।

 पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल॥

 

 पद गाए मन हरषियां, साँखी कह्यां अनंद।

 सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद॥

 

 मैं जाण्यूं पढिबौ भलो, पढ़बा थैं भलौ जोग।

 राम-नाम सूं प्रीति करि, भल भल नींदौ लोग॥

 

 कबीर पढ़िबो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाई।

 बावन आखर सोधि करि, ररै ममै चित्त लाई॥

 

 पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।

 ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥

 

 करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि-करि तुंड।

 जानें-बूझै कुछ नहीं, यौं हीं आंधा रूंड॥ Go To List ↑

 


अवधूता युगन युगन हम योगी / कबीर दास

अवधूता युगन युगन हम योगी,

आवै ना जाय मिटै ना कबहूं, सबद अनाहत भोगी।

 सभी ठौर जमात हमरी, सब ही ठौर पर मेला।

 हम सब माय, सब है हम माय, हम है बहुरी अकेला।

 हम ही सिद्ध समाधि हम ही, हम मौनी हम बोले।

 रूप सरूप अरूप दिखा के, हम ही हम तो खेलें।

 कहे कबीर जो सुनो भाई साधो, ना हीं न कोई इच्छा।

 अपनी मढ़ी में आप मैं डोलूं, खेलूं सहज स्वइच्छा। Go To List ↑

 


चांणक का अंग / कबीर दास

चांणक का अंग / कबीर दास की कविताएँ
चांणक का अंग / kabir poems in hindi

इहि उदर कै कारणे, जग जाच्यों निस जाम।

 स्वामीं-पणो जो सिरि चढ्यो, सर्‌यो न एको काम॥1॥

 

स्वामी हूवा सीतका, पैकाकार पचास।

 रामनाम कांठै रह्या, करै सिषां की आस॥2॥

 

कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि धरी खटाइ।

 राज-दुबारां यौ फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ॥3॥

 

कलि का स्वामी लोभिया, मनसा धरी बधाइ।

 दैंहि पईसा ब्याज कौं, लेखां करतां जाइ॥4॥

 

 कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ।

 लालच लोभी मसकरा, तिनकूँ आदर होइ॥5॥

 

ब्राह्मण गुरु जगत का, साधू का गुरु नाहिं।

 उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिउँ बेदां माहिं॥6॥

 

चतुराई सूवै पढ़ी, सोई पंजर माहिं।

 फिरि प्रमोधै आन कौं, आपण समझै नाहिं॥7॥

 

तीरथ करि करि जग मुवा, डूँघै पाणीं न्हाइ।

 रामहि राम जपंतडां, काल घसीट्यां जाइ॥8॥

 

 कबीर इस संसार कौं, समझाऊँ कै बार।

 पूँछ जो पकड़ै भेड़ की, उतर्‌या चाहै पार॥9॥

 

 कबीर मन फूल्या फिरैं, करता हूँ मैं ध्रंम।

 कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम॥10॥ Go To List ↑

 


समरथाई का अंग / कबीर दास

जिसहि न कोई तिसहि तू, जिस तू तिस ब कोइ ।

 दरिगह तेरी सांईयां , ना मरूम कोइ होइ ॥1॥

 

सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ ।

 धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ ॥2॥

 

अबरन कौं का बरनिये, मोपै लख्या न जाइ ।

 अपना बाना वाहिया, कहि कहि थाके माइ ॥3॥

झल बावैं झल दाहिनैं, झलहि माहिं व्यौहार ।

 आगैं पीछैं झलमई, राखैं सिरजन हार ॥4॥

 

सांई मेरा बाणियां, सहजि करै ब्यौपार ।

 बिन डांडी बिन पालड़ैं, तोले सब संसार ॥5॥

 

साईं सूं सब होत है, बंदै तै कुछ नाहिं ।

 राईं तै परबत करै, परबत राई माहिं ॥6॥ Go To List ↑

 


अंखियां तो झाईं परी / कबीर दास

अंखियां तो झाईं परी,

पंथ निहारि निहारि।

 जीहड़ियां छाला परया,

नाम पुकारि पुकारि।

 बिरह कमन्डल कर लिये,

बैरागी दो नैन।

 मांगे दरस मधुकरी,

छकै रहै दिन रैन।

 सब रंग तांति रबाब तन,

बिरह बजावै नित।

 और न कोइ सुनि सकै,

कै सांई के चित। Go To List ↑

 


कबीर के पद / कबीर दास

कबीर के पद / कबीर / kabir das poems in hindi with meaning
कबीर के पद / कबीर / kabir das poems in hindi with meaning

1.

प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्‍यों आया त्‍यों जावैगा॥

 सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्‍या क्‍या बीता॥

 सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावैगा॥

 परली पार मेरा मीता खडि़या, उस मिलने का ध्‍यान न धरिया॥

 टूटी नाव, उपर जो बैठा, गाफिल गोता खावैगा॥

 दास कबीर कहैं समझाई, अंतकाल तेरा कौन सहाई॥

 चला अकेला संग न कोई, किया अपना पावैगा॥

 

2.

रहना नहीं देस बिराना है॥

 यह संसार कागद की पुडि़या, बूँद पड़े घुल जाना है॥

 यह संसार काँटे की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है॥

 यह संसार झाड़ और झाँखर, आग लगे बरि जाना है॥

 कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है॥ Go To List ↑

 


बहुरि नहिं आवना या देस / कबीर दास

बहुरि नहिं आवना या देस ॥

 जो जो गए बहुरि नहि आए,

पठवत नाहिं सेस ॥1॥

 

सुर नर मुनि अरु पीर औलिया,

देवी देव गनेस ॥2॥

 

धरि धरि जनम सबै,

भरमे हैं ब्रह्मा विष्णु महेस ॥3॥

 

जोगी जङ्गम औ संन्यासी,

दीगंबर दरवेस ॥4॥

 

चुंडित, मुंडित पंडित लोई,

सरग रसातल सेस ॥5॥

 

ज्ञानी, गुनी, चतुर अरु कविता,

राजा रंक नरेस ॥6॥

 

कोइ राम कोइ रहिम बखानै,

कोइ कहै आदेस ॥7॥

 

नाना भेष बनाय सबै,

मिलि ढूऊंढि फिरें चहुँ देस ॥8॥

 

कहै कबीर अंत ना पैहो,

बिन सतगुरु उपदेश ॥9॥ Go To List ↑

 


जीवन-मृतक का अंग / कबीर दास

जीवन-मृतक का अंग / कबीर की कविता
जीवन-मृतक का अंग / कबीर की कविता

 कबीर मन मृतक भया, दुर्बल भया सरीर ।

 तब पैंडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर ,कबीर ॥1॥

 

जीवन तै मरिबो भलौ, जो मरि जानैं कोइ ।

 मरनैं पहली जे मरै, तो कलि अजरावर होइ ॥2॥

 

आपा मेट्या हरि मिलै, हरि मेट्या सब जाइ ।

 अकथ कहाणी प्रेम की, कह्यां न कोउ पत्याइ ॥3॥

 

 कबीर चेरा संत का, दासनि का परदास ।

 कबीर ऐसैं होइ रह्या, ज्यूं पाऊँ तलि घास ॥4॥

 

रोड़ा ह्वै रहो बाट का, तजि पाषंड अभिमान ।

 ऐसा जे जन ह्वै रहै, ताहि मिलै भगवान ॥5॥ Go To List ↑

 


भेष का अंग / कबीर दास

माला पहिरे मनमुषी, ताथैं कछू न होई ।

 मन माला कौं फेरता, जग उजियारा सोइ ॥1॥

 

 कबीर माला मन की, और संसारी भेष ।

 माला पहर्‌यां हरि मिलै, तौ अरहट कै गलि देखि ॥2॥

 

माला पहर्‌यां कुछ नहीं, भगति न आई हाथ ।

 माथौ मूँछ मुँडाइ करि, चल्या जगत के साथ ॥3॥

 

साईं सेती सांच चलि, औरां सूं सुध भाइ ।

 भावै लम्बे केस करि, भावै घुरड़ि मुंडाइ ॥4॥

 

केसों कहा बिगाड़िया, जो मुँडै सौ बार ।

 मन को काहे न मूंडिये, जामैं बिषय-बिकार ॥5॥

 

स्वांग पहरि सोरहा भया, खाया पीया खूंदि ।

 जिहि सेरी साधू नीकले, सो तौ मेल्ही मूंदि ॥6॥

 

बैसनों भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक ।

 छापा तिलक बनाइ करि, दगध्या लोक अनेक ॥7॥

 

तन कों जोगी सब करै, मन कों बिरला कोइ ।

 सब सिधि सहजै पाइये, जे मन जोगी होइ ॥8॥

 

पष ले बूड़ी पृथमीं, झूठे कुल की लार ।

 अलष बिसार्‌यो भेष मैं, बूड़े काली धार ॥9॥

 

चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात ।

 एक निसप्रेही निरधार का, गाहक गोपीनाथ ॥10॥ Go To List ↑

 


नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार / कबीर दास

नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार / कबीर दास की कविताएँ
नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार / कबीर दास की कविताएँ

नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार ॥

 साहिब तुम मत भूलियो लाख लो भूलग जाये ।

 हम से तुमरे और हैं तुम सा हमरा नाहिं ।

 अंतरयामी एक तुम आतम के आधार ।

 जो तुम छोड़ो हाथ प्रभुजी कौन उतारे पार ॥

 गुरु बिन कैसे लागे पार ॥

 मैं अपराधी जन्म को मन में भरा विकार ।

 तुम दाता दुख भंजन मेरी करो सम्हार ।

 अवगुन दास कबीर के बहुत गरीब निवाज़ ।

 जो मैं पूत कपूत हूं कहौं पिता की लाज ॥

 गुरु बिन कैसे लागे पार ॥ Go To List ↑

 


मधि का अंग / कबीर दास

 कबीर दुबिधा दूरि करि,एक अंग ह्वै लागि ।

 यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि ॥1॥

 

दुखिया मूवा दुख कौं, सुखिया सुख कौं झुरि ।

 सदा अनंदी राम के, जिनि सुख दुख मेल्हे दूरि ॥2॥

 

काबा फिर कासी भया, राम भया रे रहीम ।

 मोट चून मैदा भया ,बैठि कबीरा जीम ॥3॥ Go To List ↑

 


उपदेश का अंग / कबीर दास

उपदेश का अंग / कबीर / short poems of kabir das in hindi
उपदेश का अंग / कबीर / short poems of kabir das in hindi

बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।

 दुहुं चूका रीता पड़ैं , वाकूं वार न पार॥1॥

 

 कबीर हरि के नाव सूं, प्रीति रहै इकतार।

 तो मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अन्त न फार॥2॥

 

ऐसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ।

 अपना तन सीतल करै, औरन को सुख होइ॥3॥

 

कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि।

 बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि॥4॥

 

जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होइ।

 या आपा को डारिदे, दया करै सब कोइ॥5॥

 

 

 

आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक।

 कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक॥6॥  Go To List ↑

 


करम गति टारै नाहिं टरी / कबीर दास

करम गति टारै नाहिं टरी॥

 मुनि वसिस्थ से पण्डित ज्ञानी, सिधि के लगन धरि।

 सीता हरन मरन दसरथ को, बन में बिपति परी॥1॥

कहँ वह फन्द कहाँ वह पारधि, कहँ वह मिरग चरी।

 कोटि गाय नित पुन्य करत नृग, गिरगिट-जोन परि॥2॥

पाण्डव जिनके आप सारथी, तिन पर बिपति परी।

 कहत कबीर सुनो भै साधो, होने होके रही॥3॥ Go To List ↑

 


भ्रम-बिधोंसवा का अंग / कबीर दास

भ्रम-बिधोंसवा का अंग / कबीर दास की कविताएँ
भ्रम-बिधोंसवा का अंग / कबीर दास की कविताएँ

जेती देखौं आत्मा, तेता सालिगराम ।

 साधू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सूं काम ॥1॥

जप तप दीसैं थोथरा, तीरथ ब्रत बेसास ।

 सूवै सैंबल सेविया, यौं जग चल्या निरास ॥2॥

तीरथ तो सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ ।

 कबीर मूल निकंदिया, कौंण हलाहल खाइ ॥3॥

मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि ।

 दसवां द्वारा देहुरा, तामैं जोति पिछाणि ॥4॥

 कबीर दुनिया देहुरै, सीस नवांवण जाइ ।

 हिरदा भीतर हरि बसै, तू ताही सौं ल्यौ लाइ ॥5॥

काहे री नलिनी तू कुमिलानी।

तेरे ही नालि सरोवर पानी॥

जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।

ना तलि तपति न ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि॥

कहे कबीर जे उदकि समान, ते नहिं मुए हमारे जान।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै।

हीरा पायो गाँठ गँठियायो, बार-बार वाको क्यों खोलै।

हलकी थी तब चढी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोलै।

सुरत कलाली भई मतवाली, मधवा पी गई बिन तोले।

हंसा पायो मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोलै।

तेरा साहब है घर माँहीं बाहर नैना क्यों खोलै।

कहै कबीर सुनो भई साधो, साहब मिल गए तिल ओलै॥

रहना नहिं देस बिराना है।

यह संसार कागद की पुडिया, बूँद पडे गलि जाना है।

यह संसार काँटे की बाडी, उलझ पुलझ मरि जाना है॥

यह संसार झाड और झाँखर आग लगे बरि जाना है।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतुगरु नाम ठिकाना है॥

कस्तूरी कुँडल बसै, मृग ढ़ुढ़े बब माहिँ.

ऎसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहिँ..

प्रेम ना बाड़ी उपजे, प्रेम ना हाट बिकाय.

राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देई लै जाय ..

माला फेरत जुग गाया, मिटा ना मन का फेर.

कर का मन का छाड़ि, के मन का मनका फेर..

माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया शरीर.

आशा तृष्णा ना मुई, यों कह गये कबीर ..

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.

लक चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद..

वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर.

परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर..

साधु बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय.

तपन बुझावे और की, अपनो पारस लाय..

सोना सज्जन साधु जन, टुटी जुड़ै सौ बार.

दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एके धकै दरार..

जिहिं धरि साध न पूजिए, हरि की सेवा नाहिं.

ते घर मरघट सारखे, भूत बसै तिन माहिं..

मूरख संग ना कीजिए, लोहा जल ना तिराइ.

कदली, सीप, भुजंग-मुख, एक बूंद तिहँ भाइ..

तिनका कबहुँ ना निन्दिए, जो पायन तले होय.

कबहुँ उड़न आखन परै, पीर घनेरी होय..

बोली एक अमोल है, जो कोइ बोलै जानि.

हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि..

ऐसी बानी बोलिए,मन का आपा खोय.

औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय..

लघता ते प्रभुता मिले, प्रभुत ते प्रभु दूरी.

चिट्टी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी..

निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय.

बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय..

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं.

मुकताहल मुकता चुगै, अब उड़ि अनत ना जाहिं.

हमन है इश्क मस्ताना

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?

रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,

हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?

खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,

हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,

उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,

जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।।

जब मैं था तब हरि‍ नहीं, अब हरि‍ हैं मैं नाहिं।

प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।।

जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा अपना, मुझ-सा बुरा न कोय।।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।।

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

काल्‍ह करै सो आज कर, आज करै सो अब्‍ब।

पल में परलै होयगी, बहुरि करैगो कब्‍ब।

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

दोस पराए देखि करि, चला हसंत हसंत।

अपने या न आवई, जिनका आदि न अंत।।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ग्‍यान।

मोल करो तलवार के, पड़ा रहन दो म्‍यान।।

सोना, सज्‍जन, साधुजन, टूटि जुरै सौ बार।

दुर्जन कुंभ-कुम्‍हार के, एकै धका दरार।।

पाहन पुजे तो हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।

ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार।।

काँकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय।

ता चढ़ मुल्‍ला बांग दे, बहिरा हुआ खुदाए।।

मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे ।

ना मैं बकरी ना मैं भेडी ना मैं छुरी गंडास मे ।

नही खाल में नही पूंछ में ना हड्डी ना मांस मे ॥

ना मै देवल ना मै मसजिद ना काबे कैलाश मे ।

ना तो कोनी क्रिया-कर्म मे नही जोग-बैराग मे ॥

खोजी होय तुरंतै मिलिहौं पल भर की तलास मे

मै तो रहौं सहर के बाहर मेरी पुरी मवास मे

कहै कबीर सुनो भाई साधो सब सांसो की सांस मे ॥

तेरा मेरा मनुवां

तेरा मेरा मनुवां कैसे एक होइ रे ।

मै कहता हौं आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखी ।

मै कहता सुरझावन हारी, तू राख्यो अरुझाई रे ॥

मै कहता तू जागत रहियो, तू जाता है सोई रे ।

मै कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे ॥

जुगन-जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे ।

तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोई रे ॥

सतगुरू धारा निर्मल बाहै, बामे काया धोई रे ।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ॥

बीत गये दिन भजन बिना रे ।

भजन बिना रे, भजन बिना रे ॥

बाल अवस्था खेल गवांयो ।

जब यौवन तब मान घना रे ॥

लाहे कारण मूल गवाँयो ।

अजहुं न गयी मन की तृष्णा रे ॥

कहत कबीर सुनो भई साधो ।

पार उतर गये संत जना रे ॥

राम बिनु तन को ताप न जाई ।

जल में अगन रही अधिकाई ॥

राम बिनु तन को ताप न जाई ॥

तुम जलनिधि मैं जलकर मीना ।

जल में रहहि जलहि बिनु जीना ॥

राम बिनु तन को ताप न जाई ॥

तुम पिंजरा मैं सुवना तोरा ।

दरसन देहु भाग बड़ मोरा ॥

राम बिनु तन को ताप न जाई ॥

तुम सद्गुरु मैं प्रीतम चेला ।

कहै कबीर राम रमूं अकेला ॥

राम बिनु तन को ताप न जाई ॥

भजो रे भैया राम गोविंद हरी ।

राम गोविंद हरी भजो रे भैया राम गोविंद हरी ॥

जप तप साधन नहिं कछु लागत, खरचत नहिं गठरी ॥

संतत संपत सुख के कारन, जासे भूल परी ॥

कहत कबीर राम नहीं जा मुख, ता मुख धूल भरी ॥

दिवाने मन, भजन बिना दुख पैहौ ॥

पहिला जनम भूत का पै हौ, सात जनम पछिताहौउ।

काँटा पर का पानी पैहौ, प्यासन ही मरि जैहौ ॥ १॥

दूजा जनम सुवा का पैहौ, बाग बसेरा लैहौ ।

टूटे पंख मॅंडराने अधफड प्रान गॅंवैहौ ॥ २॥

बाजीगर के बानर होइ हौ, लकडिन नाच नचैहौ ।

ऊॅंच नीच से हाय पसरि हौ, माँगे भीख न पैहौ ॥ ३॥

तेली के घर बैला होइहौ, आॅंखिन ढाँपि ढॅंपैहौउ ।

कोस पचास घरै माँ चलिहौ, बाहर होन न पैहौ ॥ ४॥

पॅंचवा जनम ऊॅंट का पैहौ, बिन तोलन बोझ लदैहौ ।

बैठे से तो उठन न पैहौ, खुरच खुरच मरि जैहौ ॥ ५॥

धोबी घर गदहा होइहौ, कटी घास नहिं पैंहौ ।

लदी लादि आपु चढि बैठे, लै घटे पहुँचैंहौ ॥ ६॥

पंछिन माँ तो कौवा होइहौ, करर करर गुहरैहौ ।

उडि के जय बैठि मैले थल, गहिरे चोंच लगैहौ ॥ ७॥

सत्तनाम की हेर न करिहौ, मन ही मन पछितैहौउ ।

कहै कबीर सुनो भै साधो, नरक नसेनी पैहौ ॥ ८॥

झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥

काहे कै ताना काहे कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥

इडा पिङ्गला ताना भरनी,

सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥

आठ कँवल दल चरखा डोलै,

पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥

साँ को सियत मास दस लागे,

ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥

सो चादर सुर नर मुनि ओढी,

ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥

दास कबीर जतन करि ओढी,

ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥

केहि समुझावौ सब जग अन्धा ॥

इक दुइ होयॅं उन्हैं समुझावौं,

सबहि भुलाने पेटके धन्धा ।

पानी घोड पवन असवरवा,

ढरकि परै जस ओसक बुन्दा ॥ १॥

गहिरी नदी अगम बहै धरवा,

खेवन- हार के पडिगा फन्दा ।

घर की वस्तु नजर नहि आवत,

दियना बारिके ढूँढत अन्धा ॥ २॥

लागी आगि सबै बन जरिगा,

बिन गुरुज्ञान भटकिगा बन्दा ।

कहै कबीर सुनो भाई साधो,

जाय लिङ्गोटी झारि के बन्दा ॥ ३॥

तूने रात गँवायी सोय के दिवस गँवाया खाय के ।

हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥

सुमिरन लगन लगाय के मुख से कछु ना बोल रे ।

बाहर का पट बंद कर ले अंतर का पट खोल रे ।

माला फेरत जुग हुआ गया ना मन का फेर रे ।

गया ना मन का फेर रे ।

हाथ का मनका छाँड़ि दे मन का मनका फेर ॥

दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय रे ।

जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय रे ।

सुख में सुमिरन ना किया दुख में करता याद रे ।

दुख में करता याद रे ।

कहे कबीर उस दास की कौन सुने फ़रियाद ॥

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

जो सुख पाऊँ राम भजन में

सो सुख नाहिं अमीरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

भला बुरा सब का सुनलीजै

कर गुजरान गरीबी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

आखिर यह तन छार मिलेगा

कहाँ फिरत मग़रूरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

प्रेम नगर में रहनी हमारी

साहिब मिले सबूरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

कहत कबीर सुनो भयी साधो

साहिब मिले सबूरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

रे दिल गाफिल गफलत मत कर,

एक दिना जम आवेगा ॥

सौदा करने या जग आया,

पूँजी लाया, मूल गॅंवाया,

प्रेमनगर का अन्त न पाया,

ज्यों आया त्यों जावेगा ॥ १॥

सुन मेरे साजन, सुन मेरे मीता,

या जीवन में क्या क्या कीता,

सिर पाहन का बोझा लीता,

आगे कौन छुडावेगा ॥ २॥

परलि पार तेरा मीता खडिया,

उस मिलने का ध्यान न धरिया,

टूटी नाव उपर जा बैठा,

गाफिल गोता खावेगा ॥ ३॥

दास कबीर कहै समुझाई,

अन्त समय तेरा कौन सहाई,

चला अकेला संग न कोई,

कीया अपना पावेगा ॥ ४॥

घूँघट का पट खोल रे, तोको पीव मिलेंगे।

घट-घट मे वह सांई रमता, कटुक वचन मत बोल रे॥

धन जोबन का गरब न कीजै, झूठा पचरंग चोल रे।

सुन्न महल मे दियना बारिले, आसन सों मत डोल रे।।

जागू जुगुत सों रंगमहल में, पिय पायो अनमोल रे।

कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे॥

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।

चंदन काठ के बनल खटोला

ता पर दुलहिन सूतल हो।

उठो सखी री माँग संवारो

दुलहा मो से रूठल हो।

आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा

नैनन अंसुवा टूटल हो

चार जाने मिल खाट उठाइन

चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो

कहत कबीर सुनो भाई साधो

जग से नाता छूटल हो

मेरी चुनरी में परिगयो दाग पिया।

पांच तत की बनी चुनरिया

सोरह सौ बैद लाग किया।

यह चुनरी मेरे मैके ते आयी

ससुरे में मनवा खोय दिया।

मल मल धोये दाग न छूटे

ग्यान का साबुन लाये पिया।

कहत कबीर दाग तब छुटि है

जब साहब अपनाय लिया।

माया महा ठगनी हम जानी।।

तिरगुन फांस लिए कर डोले

बोले मधुरे बानी।।

केसव के कमला वे बैठी

शिव के भवन भवानी।।

पंडा के मूरत वे बैठीं

तीरथ में भई पानी।।

योगी के योगन वे बैठी

राजा के घर रानी।।

काहू के हीरा वे बैठी

काहू के कौड़ी कानी।।

भगतन की भगतिन वे बैठी

बृह्मा के बृह्माणी।।

कहे कबीर सुनो भई साधो

यह सब अकथ कहानी।।

सुपने में सांइ मिले

सोवत लिया लगाए

आंख न खोलूं डरपता

मत सपना है जाए

सांइ मेरा बहुत गुण

लिखे जो हृदय माहिं

पियूं न पाणी डरपता

मत वे धोय जाहिं

नैना भीतर आव तू

नैन झांप तोहे लेउं

न मैं देखूं और को

न तेही देखण देउं

नैना अंतर आव तू

ज्यौ हौं नैन झंपेउं

ना हौं देखूं और कूँ

ना तुम देखण देउं

कबीर रेख सिंदूर की

काजर दिया न जाइ

नैनू रमैया रमि रह्या

दूजा कहॉ समाइ

मन परतीत न प्रेम रस

ना इत तन में ढंग

क्या जानै उस पीवसू

कैसे रहसी रंग

अंखियां तो छाई परी

पंथ निहारि निहारि

जीहड़ियां छाला परया

नाम पुकारि पुकारि

बिरह कमन्डल कर लिये

बैरागी दो नैन

मांगे दरस मधुकरी

छकै रहै दिन रैन

सब रंग तांति रबाब तन

बिरह बजावै नित

और न कोइ सुनि सकै

कै सांई के चित

साधो ये मुरदों का गांव

पीर मरे पैगम्बर मरिहैं

मरि हैं जिन्दा जोगी

राजा मरिहैं परजा मरिहै

मरिहैं बैद और रोगी

चंदा मरिहै सूरज मरिहै

मरिहैं धरणि आकासा

चौदां भुवन के चौधरी मरिहैं

इन्हूं की का आसा

नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं

मरि हैं सहज अठ्ठासी

तैंतीस कोट देवता मरि हैं

बड़ी काल की बाजी

नाम अनाम अनंत रहत है

दूजा तत्व न होइ

कहत कबीर सुनो भाई साधो

भटक मरो ना कोई

मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा ।।

आसन मारि मंदिर में बैठे, ब्रम्ह-छाँड़ि पूजन लगे पथरा ।।

कनवा फड़ाय जटवा बढ़ौले, दाढ़ी बाढ़ाय जोगी होई गेलें बकरा ।।

जंगल जाये जोगी धुनिया रमौले काम जराए जोगी होए गैले हिजड़ा ।।

मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ो रंगौले, गीता बाँच के होय गैले लबरा ।।

कहहिं कबीर सुनो भाई साधो, जम दरवजवा बाँधल जैबे पकड़ा ।।

निरंजन धन तुम्हरो दरबार ।

जहाँ न तनिक न्याय विचार ।।

रंगमहल में बसें मसखरे, पास तेरे सरदार ।

धूर-धूप में साधो विराजें, होये भवनिधि पार ।।

वेश्या ओढे़ खासा मखमल, गल मोतिन का हार ।

पतिव्रता को मिले न खादी सूखा ग्रास अहार ।।

पाखंडी को जग में आदर, सन्त को कहें लबार ।

अज्ञानी को परम‌ ब्रहम ज्ञानी को मूढ़ गंवार ।।

साँच कहे जग मारन धावे, झूठन को इतबार ।

कहत कबीर फकीर पुकारी, जग उल्टा व्यवहार ।।

निरंजन धन तुम्हरो दरबार । Go To List ↑

 



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