कैफी आजमी कविता / Kaifi Azmi Poems In Hindi

अगर आप भी कैफी आजमी की कविताओ के बेहद चाहीते है तो मै आपको बता दूं यह पोस्ट आपके लिए है क्योकि यहां आपको Kaifi Azmi Poems का पूरा संग्रह प्रस्तुत किया गया है जिसे आप नीचे दिये कविताओ की लिस्ट मे से चुनकर आपनी इच्छा अनुसार पढ़ सकते है ।

तो चलिए बिना किसी तरह की देर किये Kaifi Azmi Poems In Hindi की शुरूवात करते है ।

विषय सूची

कोहरे के खेत | कैफ़ी आज़मी 

कोहरे के खेत | कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems
कोहरे के खेत | कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems

वो सर्द रात जबकि सफ़र कर रहा था मैं

रंगीनियों से जर्फ़-ए-नज़र भर रहा था मैं

 

तेज़ी से जंगलों में उड़ी जा रही थी रेल

ख़्वाबीदा काएनात को चौंका रही थी रेल

 

मुड़ती उछलती काँपती चिंघाड़ती हुई

कोहरे की वो दबीज़ रिदा फ़ाड़ती हुई

 

पहियों की गर्दिशों में मचलती थी रागनी

आहन से आग बन के निकलती थी रागनी

 

पहुँची जिधर ज़मीं का कलेजा हिला दिया

दामन में तीरगी के गरेबाँ बना दिया

 

झोंके हवा के बर्फ़ बिछाते थे राह में

जल्वे समा रहे थे लरज़ कर निगाह में

 

धोके से छू गईं जो कहीं सर्द उँगलियाँ

बिच्छू सा डंक मारने लगती थीं खिड़कियाँ

 

पिछले पहर का नर्म धुँदलका था पुर-फ़िशाँ

मायूसियों में जैसे उमीदों का कारवाँ

 

बे-नूर हो के डूबने वाला था माहताब

कोहरे में खुप गई थी सितारों की आब-ओ-ताब

 

क़ब्ज़े से तीरगी के सहर छूटने को थी

मशरिक़ के हाशिए में किरन फूटने को थी

 

कोहरे में था ढके हुए बाग़ों का ये समाँ

जिस तरह ज़ेर-ए-आब झलकती हों बस्तियाँ

 

भीगी हुई ज़मीं थी नमी सी फ़ज़ा में थी

इक किश्त-ए-बर्फ़ थी कि मुअल्लक़ हवा में थी

 

जादू के फ़र्श सेहर के सब सक़्फ़-ओ-बाम थे

दोश-ए-हवा पे परियों के सीमीं ख़ियाम थे

 

थी ठण्डे-ठण्डे नूर में खोई हुई निगाह

ढल कर फ़ज़ा में आई थी हूरों की ख़्वाब-गाह

 

बन-बन के फेन सू-ए-फ़लक देखता हुआ

दरिया चला था छोड़ के दामन ज़मीन का

 

इस शबनमी धुँदलके में बगुले थे यूँ रवाँ

मौजों पे मस्त हो के चलें जैसे मछलियाँ

 

डाला कभी फ़ज़ाओं में ख़त खो गए कभी

झलके कभी उफ़ुक़ में निहाँ हो गए कभी

 

इंजन से उड़ के काँपता फिरता था यूँ धुआँ

लेता था लहर खेत में कोहरे के आसमाँ

 

उस वक़्त क्या था रूह पे सदमा न पूछिए

याद आ रहा था किस से बिछड़ना न पूछिए

 

दिल में कुछ ऐसे घाव थे तीर-ए-मलाल के

रो-रो दिया था खिड़की से गर्दन निकाल के

Go To List ↑

 


दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल

…वापस चल

मरमरीं-मरमरीं फूलों से उबलता हीरा

चाँद की आँच में दहके हुए सीमीं मीनार

ज़ेहन-ए-शाएर से ये करता हुआ चश्मक पैहम

एक मलिका का ज़िया-पोश ओ फ़ज़ा-ताब मज़ार

 

ख़ुद ब-ख़ुद फिर गए नज़रों में ब-अंदाज़-ए-सवाल

वो जो रस्तों पे पड़े रहते हैं लाशों की तरह

ख़ुश्क हो कर जो सिमट जाते हैं बे-रस आसाब

धूप में खोपड़ियाँ बजती हैं ताशों की तरह

 

दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल

…वापस चल

ये धड़कता हुआ गुम्बद में दिल-ए-शाहजहाँ

ये दर-ओ-बाम पे हँसता हुआ मलिका का शबाब

जगमगाता है हर इक तह से मज़ाक़-ए-तफ़रीक़

और तारीख़ उढ़ाती है मोहब्बत की नक़ाब

 

चाँदनी और ये महल आलम-ए-हैरत की क़सम

दूध की नहर में जिस तरह उबाल आ जाए

ऐसे सय्याह की नज़रों में खुपे क्या ये समाँ

जिस को फ़रहाद की क़िस्मत का ख़याल आ जाए

 

दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल

…वापस चल

ये दमकती हुई चौखट ये तिला-पोश कलस

इन्हीं जल्वों ने दिया क़ब्र-परस्ती को रिवाज

माह ओ अंजुम भी हुए जाते हैं मजबूर-ए-सुजूद

वाह आराम-गह-ए-मलिका-ए-माबूद-मिज़ाज

 

दीदनी क़स्र नहीं दीदनी तक़्सीम है ये

रू-ए-हस्ती पे धुआँ क़ब्र पे रक़्स-ए-अनवार

फैल जाए इसी रौज़ा का जो सिमटा दामन

कितने जाँ-दार जनाज़ों को भी मिल जाए मज़ार

 

दोस्त ! मैं देख चुका ताजमहल

…वापस चल

Go To List ↑

 


दोशीज़ा मालन | कैफ़ी आज़मी 

दोशीज़ा मालन | कैफ़ी आज़मी  / kaifi azmi poems in hindi
दोशीज़ा मालन | कैफ़ी आज़मी  / kaifi azmi poems in hindi

लो पौ फटी वो छुप गई तारों की अंजुमन

लो जाम-ए-महर से वो छलकने लगी किरन

खिंचने लगा निगाह में फ़ितरत का बाँकपन

जल्वे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन

 

गूँजे तराने सुब्ह का इक शोर हो गया

आलम मय-ए-बक़ा में शराबोर हो गया

 

फूली शफ़क़ फ़ज़ा में हिना तिलमिला गई

इक मौज-ए-रंग काँप के आलम पे छा गई

कुल चान्दनी सिमट के गुलों में समा गई

ज़र्रे बने नुजूम ज़मीं जगमगा गई

 

छोड़ा सहर ने तीरगी-ए-शब को काट के

उड़ने लगी हवा में किरन ओस चाट के

 

मचली जबीन-ए-शर्क़ पे इस तरह मौज-ए-नूर

लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क़-ए-तूर

उड़ने लगी शमीम छलकने लगा सुरूर

खिलने लगे शगूफ़े चहकने लगे तुयूर

 

झोंके चले हवा के शजर झूमने लगे

मस्ती में फूल काँटों का मुँह चूमने लगे

 

थम-थम के ज़ौ-फ़िशाँ हुआ ज़र्रों पे आफ़्ताब

छिड़का हवा ने सब्ज़ा-ए-ख़्वाबीदा पर गुलाब

 

मुरझाई पत्तियों में मचलने लगा शबाब

लर्ज़िश हुई गुलों को बरसने लगी शराब

रिंदान-ए-मस्त और भी सरमस्त हो गए

थर्रा के होंट जाम में पैवस्त हो गए

दोशीज़ा एक ख़ुश-क़द ओ ख़ुश-रंग-ओ-ख़ूब-रू

मालन की नूर-दीदा गुलिस्ताँ की आबरू

महका रही है फूलों से दामान-ए-आरज़ू

तिफ़्ली लिए है गोद में तूफ़ान-ए-रंग-ओ-बू

रंगीनियों में खेली गुलों में पली हुई

नौरस कली में क़ौस-ए-क़ुज़ह है ढली हुई

मस्ती में रुख़ पे बाल परेशाँ किए हुए

बादल में शम-ए-तूर फ़रोज़ाँ किए हुए

हर सम्त नक़्श-ए-पा से चराग़ाँ किए हुए

आँचल को बार-ए-गुल से गुलिस्ताँ किए हुए

लहरा रही है बाद-ए-सहर पाँव चूम के

फिरती है तीतरी-सी ग़ज़ब झूम-झूम के

ज़ुल्फ़ों में ताब-ए-सुम्बुल-ए-पेचाँ लिए हुए

आरिज़ में शोख़ रंग-ए-गुलिस्ताँ लिए हुए

आँखों में रूह-ए-बादा-ए-इरफ़ाँ लिए हुए

होंटों में आब-ए-लाल-ए-बदख़्शाँ लिए हुए

फ़ितरत ने तोल तोल के चश्म-ए-क़ुबूल में

सारा चमन निचोड़ दिया एक फूल में

ऐ हूर-ए-बाग़ इतनी ख़ुदी से न काम ले

उड़ कर शमीम-ए-गुल कहीं आँचल न थाम ले

कलियों का ले पयाम सहर का सलाम ले

कैफ़ी से हुस्न-ए-दोस्त का ताज़ा कलाम ले

शाएर का दिल है मुफ़्त में क्यूँ दर्द-मन्द हो

इक गुल इधर भी नज़्म अगर ये पसन्द हो

Go To List ↑

 


तलाश | कैफ़ी आज़मी

ये बुझी सी शाम ये सहमी हुई परछाइयाँ

ख़ून-ए-दिल भी इस फ़ज़ा में रंग भर सकता नहीं

आ उतर आ काँपते होंटों पे ऐ मायूस आह

सक़्फ़-ए-ज़िन्दाँ पर कोई पर्वाज़ कर सकता नहीं

झिलमिलाए मेरी पलकों पे मह-ओ-ख़ुर भी तो क्या?

इस अन्धेरे घर में इक तारा उतर सकता नहीं

लूट ली ज़ुल्मत ने रू-ए-हिन्द की ताबिन्दगी

रात के काँधे पे सर रख कर सितारे सो गए

वो भयानक आँधियाँ, वो अबतरी, वो ख़लफ़शार

कारवाँ बे-राह हो निकला, मुसाफ़िर खो गए

हैं इसी ऐवान-ए-बे-दर में यक़ीनन रहनुमा

आ के क्यूँ दीवार तक नक़्श-ए-क़दम गुम हो गए

देख ऐ जोश-ए-अमल वो सक़्फ़ ये दीवार है

एक रौज़न खोल देना भी कोई दुश्वार है

Go To List ↑

 


तसव्वुर | कैफ़ी आज़मी 

तसव्वुर | कैफ़ी आज़मी  / aurat poem by kaifi azmi in hindi
तसव्वुर | कैफ़ी आज़मी  / aurat poem by kaifi azmi in hindi

ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

कि जैसे सचमुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो

ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू

शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू

नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू

तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू

हज़ारों जादू जगा रही हो

ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलन्द क़ामत

निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त

धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत

हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत

लचक लचक गुनगुना रही हो

ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी

जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी

भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी

घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी

कि आज तक आज़मा रही हो

ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी

वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी

मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी

जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी

क़रीब बढ़ती ही आ रही हो

ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Go To List ↑

 


दूसरा बनबास | कैफ़ी आज़मी

राम बन-बास से जब लौट के घर में आए

याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा

छे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा

इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ

प्यार की काहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ

मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए

धर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन

घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन

घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर

तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर

है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए

पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे

कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे

पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे

राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे

छे दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे

Go To List ↑

 


दाएरा | कैफ़ी आज़मी 

दाएरा | कैफ़ी आज़मी  / कैफी आजमी कविता
दाएरा | कैफ़ी आज़मी  / कैफी आजमी कविता

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे

फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ

बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को

उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ

रोज़ बसते हैं कई शहर नए

रोज़ धरती में समा जाते हैं

ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी

वो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत

न कहीं धूप न साया न सराब

कितने अरमान हैं किस सहरा में

कौन रखता है मज़ारों का हिसाब

नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है

दिल का मामूल है घबराना भी

रात अन्धेरे ने अन्धेरे से कहा

एक आदत है जिए जाना भी

क़ौस इक रंग की होती है तुलू

एक ही चाल भी पैमाने की

गोशे-गोशे में खड़ी है मस्जिद

शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की

कोई कहता था समुन्दर हूँ मैं

और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं

ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ

अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं

अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ

कभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह

चन्द रेखाओं में सीमाओं में

ज़िन्दगी क़ैद है सीता की तरह

राम कब लौटेंगे मालूम नहीं

काश रावण ही कोई आ जाता

Go To List ↑

 


नई सुब्‍ह | कैफ़ी आज़मी

ये सेहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानी

उफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे

छलकती रौशनी तारीकियों पे छाई जाती है

उड़ाए नाज़ियत की लाश पर कोई कफ़न जैसे

उबलती सुर्ख़ियों की ज़द पे हैं हल्क़े सियाही के

पड़ी हो आग में बिखरी ग़ुलामी की रसन जैसे

शफ़क़ की चादरें रंगीं फ़ज़ा में थरथराती हैं

उड़ाए लाल झण्डा इश्तिराकी अंजुमन जैसे

चली आती है शर्माई लजाई हूर-ए-बेदारी

भरे घर में क़दम थम-थम के रखती है दुल्हन जैसे

फ़ज़ा गूँजी हुई है सुब्ह के ताज़ा तरानों से

सुरूद-ए-फ़त्ह पर हैं सुर्ख़ फ़ौजें नग़्मा-ज़न जैसे

हवा की नर्म लहरें गुदगुदाती हैं उमंगों को

जवाँ जज़्बात से करता हो चुहलें बाँकपन जैसे

ये सादा-सादा गर्दूं पे तबस्सुम-आफ़रीं सूरज

पै-दर-पै कामयाबी से हो स्तालिन मगन जैसे

सहर के आइने में देखता हूँ हुस्न-ए-मुस्तक़बिल

उतर आई है चश्म-ए-शौक़ में कैफ़ी किरन जैसे

Go To List ↑

 


नए ख़ाके | कैफ़ी आज़मी 

नए ख़ाके | कैफ़ी आज़मी aurat nazm by kaifi azmi
नए ख़ाके | कैफ़ी आज़मी aurat nazm by kaifi azmi

नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना

मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना

ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है

धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िन्दगी का मुआमला है

ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है

न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम

कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम

शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम

सजा लें सब अपनी अपनी जन्नत अब ऐसे ख़ाके बना के उठना

ख़ज़ाना-ए-रंग-ओ-नूर तारीक रहगुज़ारों में लुट रहा है

उरूस-ए-गुल का ग़ुरूर-ए-इस्मत सियाहकारों में लुट रहा है

तमाम सरमाया-ए-लताफ़त ज़लील ख़ारों में लुट रहा है

घुटी घुटी हैं नुमू की साँसें छुटी छुटी नब्ज़-ए-गुलिस्ताँ है

हैं गुरसना फूल, तिश्ना ग़ुंचे, रुख़ों पे ज़र्दी लबों पे जाँ है

असीर हैं हम-सफ़ीर जब से ख़िज़ाँ चमन में रवाँ-दवाँ है

इस इन्तिशार-ए-चमन की सौगन्द बाब-ए-ज़िन्दाँ हिला के उठना

हयात-ए-गीती की आज बदली हुई निगाहें हैं इंक़िलाबी

उफ़ुक़ से किरनें उतर रही हैं बिखेरती नूर-ए-कामयाबी

नई सहर चाहती है ख़्वाबों की बज़्म में इज़्न-ए-बारयाबी

ये तीरगी का हुजूम कब तक ये यास का अज़दहाम कब तक

निफ़ाक़ ओ ग़फ़लत की आड़ ले कर जिएगा मुर्दा निज़ाम कब तक

रहेंगे हिन्दी असीर कब तक रहेगा भारत ग़ुलाम कब तक

गले का तौक़ आ रहे क़दम पर कुछ इस तरह तिलमिला के उठना

Go To List ↑

 


नया हुस्न | कैफ़ी आज़मी

कितनी रंगीं है फ़ज़ा कितनी हसीं है दुनिया

कितना सरशार है ज़ौक़-ए-चमन-आराई आज

इस सलीक़े से सजाई गई बज़्म-ए-गीती

तू भी दीवार-ए-अजन्ता से उतर आई आज

रू-नुमाई की ये साअत ये तही-दस्ती-ए-शौक़

न चुरा सकता हूँ आँखें न मिला सकता हूँ

प्यार सौग़ात, वफ़ा नज़्र, मोहब्बत तोहफ़ा

यही दौलत तिरे क़दमों पे लुटा सकता हूँ

कब से तख़्ईल में लर्ज़ां था ये नाज़ुक पैकर

कब से ख़्वाबों में मचलती थी जवानी तेरी

मेरे अफ़्साने का उनवान बनी जाती है

ढल के साँचे में हक़ीक़त के कहानी तेरी

मरहले झेल के निखरा है मज़ाक़-ए-तख़्लीक़

सई-ए-पैहम ने दिए हैं ये ख़द-ओ-ख़ाल तुझे

ज़िन्दगी चलती रही काँटों पे, अँगारों पर

जब मिली इतनी हसीं, इतनी सुबुक चाल तुझे

तेरे क़ामत में है इंसाँ की बुलन्दी का वक़ार

दुख़्तर-ए-शहर है, तहज़ीब का शहकार है तू

अब न झपकेगी पलक, अब न हटेंगी नज़रें

हुस्न का मेरे लिए आख़िरी मेआर है तू

ये तिरा पैकर-ए-सीमीं, ये गुलाबी सारी

दस्त-ए-मेहनत ने शफ़क़ बन के उढ़ा दी तुझ को

जिस से महरूम है फ़ितरत का जमाल-ए-रंगीं

तर्बियत ने वो लताफ़त भी सिखा दी तुझ को

आगही ने तिरी बातों में खिलाईं कलियाँ

इल्म ने शक्करीं लहजे में निचोड़े अंगूर

दिलरुबाई का ये अन्दाज़ किसे आता था

तू है जिस साँस में नज़दीक उसी साँस में दूर

ये लताफ़त, ये नज़ाकत, ये हया, ये शोख़ी

सौ दिए जुलते हैं उमड़ी हुई ज़ुल्मत के ख़िलाफ़

लब-ए-शादाब पे छलकी हुई गुलनार हँसी

इक बग़ावत है ये आईन-ए-जराहत के ख़िलाफ़

हौसले जाग उठे सोज़-ए-यक़ीं जाग उठा

निगह-ए-नाज़ के बे-नाम इशारों को सलाम

तू जहाँ रहती है उस अर्ज़-ए-हसीं पर सज्दा

जिन में तू मिलती है उन राह-गुज़ारों को सलाम

आ क़रीब आ कि ये जूड़ा मैं परेशाँ कर दूँ

तिश्ना-कामी को घटाओं का पयाम आ जाए

जिस के माथे से उभरती हैं हज़ारों सुब्हें

मिरी दुनिया में भी ऐसी कोई शाम आ जाए

Go To List ↑

 


नेहरू | कैफ़ी आज़मी 

नेहरू | कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems in hindi
नेहरू | कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems in hindi

मैं ने तन्हा कभी उस को देखा नहीं

फिर भी जब उस को देखा वो तन्हा मिला

जैसे सहरा में चश्मा कहीं

या समुन्दर में मीनार-ए-नूर

या कोई फ़िक्र-ए-औहाम में

फ़िक्र सदियों अकेली अकेली रही

ज़ेहन सदियों अकेला अकेला मिला

और अकेला अकेला भटकता रहा

हर नए हर पुराने ज़माने में वो

बे-ज़बाँ तीरगी में कभी

और कभी चीख़ती धूप में

चाँदनी में कभी ख़्वाब की

उस की तक़दीर थी इक मुसलसल तलाश

ख़ुद को ढूँडा किया हर फ़साने में वो

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई

क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा

ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो

ज़िंदगी का हो कोई जिहाद

वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद

सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

जिन तक़ाज़ों ने उस को दिया था जनम

उन की आग़ोश में फिर समाया न वो

ख़ून में वेद गूँजे हुए

और जबीं पर फ़रोज़ाँ अज़ाँ

और सीने पे रक़्साँ सलीब

बे-झिझक सब के क़ाबू में आया न वो

हाथ में उस के क्या था जो देता हमें

सिर्फ़ इक कील उस कील का इक निशाँ

नश्शा-ए-मय कोई चीज़ है

इक घड़ी दो घड़ी एक रात

और हासिल वही दर्द-ए-सर

उस ने ज़िन्दाँ में लेकिन पिया था जो ज़हर

उठ के सीने से बैठा न इस का धुआँ

Go To List ↑

 


प्यार का जश्न | कैफ़ी आज़मी

प्यार का जश्न नई तरह मनाना होगा

ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा

काँपते होंटों पे पैमान-ए-वफ़ा क्या कहना

तुझ को लाई है कहाँ लग़्ज़िश-ए-पा क्या कहना

मेरे घर में तिरे मुखड़े की ज़िया क्या कहना

आज हर घर का दिया मुझ को जलाना होगा

रूह चेहरों पे धुआँ देख के शरमाती है

झेंपी झेंपी सी मिरे लब पे हँसी आती है

तेरे मिलने की ख़ुशी दर्द बनी जाती है

हम को हँसना है तो औरों को हँसाना होगा

सोई सोई हुई आँखों में छलकते हुए जाम

खोई खोई हुई नज़रों में मोहब्बत का पयाम

लब शीरीं पे मिरी तिश्ना-लबी का इनआम

जाने इनआम मिलेगा कि चुराना होगा

मेरी गर्दन में तिरी सन्दली बाहोँ का ये हार

अभी आँसू थे इन आँखों में अभी इतना ख़ुमार

मैं न कहता था मिरे घर में भी आएगी बहार

शर्त इतनी थी कि पहले तुझे आना होगा

Go To List ↑

 


अंदेशे – कैफ़ी आज़मी 

अंदेशे - कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems
अंदेशे – कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems

रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है

दिल ही शोला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है

वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है

रंज तो ये है के रो-रो के भुलाया होगा

वो कहाँ और कहाँ काहिफ़-ए-ग़म सोज़िश-ए-जाँ

उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिरमा

उस का एहसास-ए-लतीफ़ और शिकस्त-ए-अरमा

तानाज़न एक ज़माना नज़र आया होगा

झुक गई होगी जवाँ-साल उमंगों की जबीं

मिट गई होगी ललक डूब गया होगा यक़ीं

छा गया होगा धुआँ घूम गई होगी ज़मीं

अपने पहले ही घरोंदे को जो ढाया होगा

दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाये होंगे

अश्क आँखों ने पिये और न बहाये होंगे

बन्द कमरे में जो ख़त मेरे जलाये होंगे

इक-इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा

उस ने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी

मिट के इक नक़्श ने सौ शक़्ल दिखाई होगी

मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी

हर तरफ़ मुझ को तड़पता हुआ पाया होगा

बेमहल छेड़ पे जज़्बात उबल आये होंगे

ग़म पशेमा तबस्सुम में ढल आये होंगे

नाम पर मेरे जब आँसू निकल आये होंगे

सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा

ज़ुल्फ़ ज़िद कर के किसी ने जो बनाई होगी

रूठे जलवों पे ख़िज़ाँ और भी छाई होगी

बर्क़ आँखों ने कई दिन न गिराई होगी

रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा

होके मजबूर मुझे उस ने भुलाया होगा

ज़हर चुप कर के दवा जान के ख़ाया होगा

Go To List ↑

 


आवारा सजदे | कैफ़ी आज़मी

इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मेरा सरमाया है

दोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़र करूँ

कोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहीं

किस को दिल नज़र करूँ और किसे जाँ नज़र करूँ?

तुम भी महबूब मेरे तुम भी हो दिलदार मेरे

आशना मुझ से मगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं

ख़त्म है तुम पे मसीहानफ़सी चारागरी

मेहरम-ए-दर्द-ए-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं

अपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहीं

दस्त-ओ-बाज़ू मेरे नाकारा हुए जाते हैं

जिन से हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़

आज सजदे वही आवारा हुए जाते हैँ

दूर मंज़िल थी मगर ऐसी भी कुछ दूर न थी

लेके फिरती रही रास्ते ही में वहशत मुझ को

एक ज़ख़्म ऐसा न खाया के बहार आ जाती

दार तक लेके गया शौक़-ए-शहादत मुझ को

राह में टूट गये पाँव तो मालूम हुआ

जुज़ मेरे और मेरा रहनुमा कोई नहीं

एक के बाद ख़ुदा एक चला आता था

कह दिया अक़्ल ने तंग आके ख़ुदा कोई नहीं

Go To List ↑

 


अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ  –  कैफ़ी आज़मी 

अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ  -  कैफ़ी आज़मी / aurat poem by kaifi azmi in hindi
अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ  –  कैफ़ी आज़मी / aurat poem by kaifi azmi in hindi

अज़ा में बहते थे आँसू यहाँ, लहू तो नहीं

ये कोई और जगह है ये लखनऊ तो नहीं

यहाँ तो चलती हैं छुरिया ज़ुबाँ से पहले

ये मीर अनीस की, आतिश की गुफ़्तगू तो नहीं

चमक रहा है जो दामन पे दोनों फ़िरक़ों के

बग़ौर देखो ये इस्लाम का लहू तो नहीं

Go To List ↑

 


आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है | कैफ़ी आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,

आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,

सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,

कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।

ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी,

पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने,

इन मकानों को ख़बर है न, मकीनों को ख़बर

उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने ।

हाथ ढलते गए साँचों में तो थकते कैसे,

नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने,

की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द,

बाम-ओ-दर और ज़रा और निखारे हमने ।

आँधियाँ तोड़ लिया करतीं थीं शामों की लौएँ,

जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हमने,

बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया,

सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिए ।

अपनी नस-नस में लिए मेहनत-ए-पैहम की थकन,

बन्द आँखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए,

दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक,

रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए ।

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,

आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी,

सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,

कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।

Go To List ↑

 


आज सोचा तो आँसू भर आए | कैफ़ी आज़मी

आज सोचा तो आँसू भर आए

मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए

हर कदम पर उधर मुड़ के देखा

उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं

याद इतना भी कोई न आए

रह गई ज़िंदगी दर्द बनके

दर्द दिल में छुपाए छुपाए

Go To List ↑

 


गुरुदत्त के लिए नोहा | कैफ़ी आज़मी

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुन्दर

राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई

इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी

यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई

माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे

बे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई

साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा

अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई

हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना

क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई

अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के

नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Go To List ↑

 


इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े | कैफ़ी आज़मी

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े | कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े | कैफ़ी आज़मी / kaifi azmi poems

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े

हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़म

यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है

एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह

जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

साक़ी सभी को है ग़म-ए-तश्नालबी मगर

मय है उसी के नाम पे जिस के उबल पड़े

Go To List ↑

 


एक बोसा | कैफ़ी आज़मी

जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को

सौ चराग अँधेरे में जगमगाने लगते हैं

फूल क्या शगूफे क्या चाँद क्या सितारे क्या

सब रकीब कदमों पर सर झुकाने लगते हैं

रक्स करने लगतीं हैं मूरतें अजन्ता की

मुद्दतों के लब-बस्ता ग़ार गाने लगते हैं

फूल खिलने लगते हैं उजड़े उजड़े गुलशन में

प्यासी प्यासी धरती पर अब्र छाने लगते हैं

लम्हें भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है

लम्हें भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं

Go To List ↑

 


एक दुआ | कैफ़ी आज़मी

अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझे

बस एक दुआ कि ख़ुदा तुझको कामयाब करे

वो टाँक दे तेरे आँचल में चाँद और तारे

तू अपने वास्ते जिस को भी इंतख़ाब करे

Go To List ↑

 


ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है? | कैफ़ी आज़मी

ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है?

तेरी हर लहर से बारूद की बू आती है!

खून कहाँ बहता है इन्सान का पानी की तरह

जिस से तू रोज़ यहाँ करके वजू आती है?

धाज्जियाँ तूने नकाबों की गिनी तो होंगी

यूँ ही लौट आती है या कर के रफ़ू आती है?

अपने सीने में चुरा लाई है किसे की आहें

मल के रुखसार पे किस किस का लहू आती है!

Go To List ↑

 



  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •