काका हाथरसी की कविता / Kaka Hathrasi Poems In Hindi

काका हाथरसी का जन्म हाथरस मे हुआ था । जिनकी ( काका हाथरसी ) की कविताओ को हम इस पोस्ट मे पढने वाले है ।

Kaka Hathrasi Poems समाज मे अपने जागरूकता फैलाती रही है क्योकि काका हाथरसी की हास्य कविताओ के लिए ज्यादा माने-जाने जाते है और लोगो को मनोरंजित भी करते है ।

तो चलिए बिना किसी तरह कि देर किये Kaka Hathrasi Poems In Hindi की शुरूवात करते है ।

विषय सूची

नाम बड़े दर्शन छोटे / काका हाथरसी

नाम बड़े दर्शन छोटे / काका हाथरसी
काका हाथरसी की हास्य कविता

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर?

नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और।

 शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने,

बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने।

 

 कहं ‘काका’ कवि, दयारामजी मारे मच्छर,

विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर।

 मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप,

श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप।

 

 जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट हैण्ट में-

ज्ञानचंद छ्ह बार फेल हो गए टैंथ में।

 कहं ‘काका’ ज्वालाप्रसादजी बिल्कुल ठंडे,

पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे।

 

 देख, अशर्फीलाल के घर में टूटी खाट,

सेठ छदम्मीलाल के मील चल रहे आठ।

 मील चल रहे आठ, कर्म के मिटें न लेखे,

धनीरामजी हमने प्राय: निर्धन देखे।

 

 कहं ‘काका’ कवि, दूल्हेराम मर गए कंवारे,

बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बिचारे।

 दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल,

मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल।

 

 रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं,

ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भोंक रहे हैं।

‘काका’ छ्ह फिट लंबे छोटूराम बनाए,

नाम दिगम्बरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए।

 

 पेट न अपना भर सके जीवन-भर जगपाल,

बिना सूंड के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल।

 मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज सम्हारी-

बैग कुली को दिया चले मिस्टर गिरिधारी।

 

 कहं ‘काका’ कविराय, करें लाखों का सट्टा,

नाम हवेलीराम किराए का है अट्टा।

 दूर युद्ध से भागते, नाम रखा रणधीर,

भागचंद की आज तक सोई है तकदीर।

 

 सोई है तकदीर, बहुत-से देखे-भाले,

निकले प्रिय सुखदेव सभी, दु:ख देने वाले।

 कहं ‘काका’ कविराय, आंकड़े बिल्कुल सच्चे,

बालकराम ब्रह्मचारी के बारह बच्चे।

 

चतुरसेन बुद्धू मिले, बुद्धसेन निर्बुद्ध,

श्री आनन्दीलालजी रहें सर्वदा क्रुद्ध।

 रहें सर्वदा क्रुद्ध, मास्टर चक्कर खाते,

इंसानों को मुंशी, तोताराम पढ़ाते,

कहं ‘काका’, बलवीरसिंहजी लटे हुए हैं,

थानसिंह के सारे कपड़े फटे हुए हैं।

 

बेच रहे हैं कोयला, लाला हीरालाल,

सूखे गंगारामजी, रूखे मक्खनलाल।

 रूखे मक्खनलाल, झींकते दादा-दादी-

निकले बेटा आसाराम निराशावादी।

 

 कहं ‘काका’, कवि भीमसेन पिद्दी-से दिखते,

कविवर ‘दिनकर’ छायावादी कविता लिखते।

आकुल-व्याकुल दीखते शर्मा परमानंद,

कार्य अधूरा छोड़कर भागे पूरनचंद।

 भागे पूरनचंद, अमरजी मरते देखे,

मिश्रीबाबू कड़वी बातें करते देखे।

 

 कहं ‘काका’ भण्डारसिंहजी रोते-थोते,

बीत गया जीवन विनोद का रोते-धोते।

शीला जीजी लड़ रही, सरला करती शोर,

कुसुम, कमल, पुष्पा, सुमन निकलीं बड़ी कठोर।

 निकलीं बड़ी कठोर, निर्मला मन की मैली

 सुधा सहेली अमृतबाई सुनीं विषैली।

 

 कहं ‘काका’ कवि, बाबू जी क्या देखा तुमने?

बल्ली जैसी मिस लल्ली देखी है हमने।

 तेजपालजी मौथरे, मरियल-से मलखान,

लाला दानसहाय ने करी न कौड़ी दान।

 करी न कौड़ी दान, बात अचरज की भाई,

वंशीधर ने जीवन-भर वंशी न बजाई।

 

 कहं ‘काका’ कवि, फूलचंदनजी इतने भारी-

दर्शन करके कुर्सी टूट जाय बेचारी।

 खट्टे-खारी-खुरखुरे मृदुलाजी के बैन,

मृगनैनी के देखिए चिलगोजा-से नैन।

 चिलगोजा-से नैन, शांता करती दंगा,

नल पर न्हातीं गोदावरी, गोमती, गंगा।

 

 कहं ‘काका’ कवि, लज्जावती दहाड़ रही है,

दर्शनदेवी लम्बा घूंघट काढ़ रही है।

 कलीयुग में कैसे निभे पति-पत्नी का साथ,

चपलादेवी को मिले बाबू भोलानाथ।

 बाबू भोलानाथ, कहां तक कहें कहानी,

पंडित रामचंद्र की पत्नी राधारानी।

 

‘काका’ लक्ष्मीनारायण की गृहणी रीता,

कृष्णचंद्र की वाइफ बनकर आई सीता।

अज्ञानी निकले निरे, पंडित ज्ञानीराम,

कौशल्या के पुत्र का रक्खा दशरथ नाम।

 रक्खा दशरथ नाम, मेल क्या खुब मिलाया,

दूल्हा संतराम को आई दुलहिन माया।

 

‘काका’ कोई-कोई रिश्ता बड़ा निकम्मा-

पार्वतीदेवी है शिवशंकर की अम्मा।

पूंछ न आधी इंच भी, कहलाते हनुमान,

मिले न अर्जुनलाल के घर में तीर-कमान।

 घर में तीर-कमान, बदी करता है नेका,

तीर्थराज ने कभी इलाहाबाद न देखा।

 

 सत्यपाल ‘काका’ की रकम डकार चुके हैं,

विजयसिंह दस बार इलैक्शन हार चुके हैं।

 सुखीरामजी अति दुखी, दुखीराम अलमस्त,

हिकमतराय हकीमजी रहें सदा अस्वस्थ।

 रहें सदा अस्वस्थ, प्रभु की देखो माया,

प्रेमचंद में रत्ती-भर भी प्रेम न पाया।

 

 कहं ‘काका’ जब व्रत-उपवासों के दिन आते,

त्यागी साहब, अन्न त्यागकार रिश्वत खाते।

रामराज के घाट पर आता जब भूचाल,

लुढ़क जायं श्री तख्तमल, बैठें घूरेलाल।

 बैठें घूरेलाल, रंग किस्मत दिखलाती,

इतरसिंह के कपड़ों में भी बदबू आती।

 

 कहं ‘काका’, गंभीरसिंह मुंह फाड़ रहे हैं,

महाराज लाला की गद्दी झाड़ रहे हैं।

 दूधनाथजी पी रहे सपरेटा की चाय,

गुरू गोपालप्रसाद के घर में मिली न गाय।

 घर में मिली न गाय, समझ लो असली कारण-

मक्खन छोड़ डालडा खाते बृजनारायण।

 

‘काका’, प्यारेलाल सदा गुर्राते देखे,

हरिश्चंद्रजी झूठे केस लड़ाते देखे।

रूपराम के रूप की निन्दा करते मित्र,

चकित रह गए देखकर कामराज का चित्र।

 

 कामराज का चित्र, थक गए करके विनती,

यादराम को याद न होती सौ तक गिनती,

कहं ‘काका’ कविराय, बड़े निकले बेदर्दी,

भरतराम ने चरतराम पर नालिश कर दी।

 

नाम-धाम से काम का क्या है सामंजस्य?

किसी पार्टी के नहीं झंडाराम सदस्य।

 झंडाराम सदस्य, भाग्य की मिटें न रेखा,

स्वर्णसिंह के हाथ कड़ा लोहे का देखा।

 कहं ‘काका’, कंठस्थ करो, यह बड़े काम की,

माला पूरी हुई एक सौ आठ नाम की। Go To List ↑

 


आई में आ गए / काका हाथरसी

आई में आ गए / काका हाथरसी / काका हाथरसी की कविता
आई में आ गए / काका हाथरसी / काका हाथरसी की कविता

सीधी नजर हुयी तो सीट पर बिठा गए।

 टेढी हुयी तो कान पकड कर उठा गये।

 सुन कर रिजल्ट गिर पडे दौरा पडा दिल का।

 डाक्टर इलेक्शन का रियेक्शन बता गये ।

 अन्दर से हंस रहे है विरोधी की मौत पर।

 ऊपर से ग्लीसरीन के आंसू बहा गये ।

 भूंखो के पेट देखकर नेताजी रो पडे ।

 पार्टी में बीस खस्ता कचौडी उडा गये ।

 जब देखा अपने दल में कोई दम नही रहा ।

 मारी छलांग खाई से “आई“ में आ गये ।

 करते रहो आलोचना देते रहो गाली

 मंत्री की कुर्सी मिल गई गंगा नहा गए ।

 काका ने पूछा साहब ये लेडी कौन है

थी प्रेमिका मगर उसे सिस्टर बता गए।। Go To List ↑

 


कालिज स्टूडैंट / काका हाथरसी

फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸

लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।

 कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸

दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।

 कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸

मौज कर रहे पुत्र¸ हडि्डयां घिसते फादर।

 पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸

होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल।

 फस्र्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸

साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।

 कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸

मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।

 प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸

लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।

 मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸

शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।

 कहें काका कवि राय¸ भयंकर तुमको देता¸

बन सकते हो इसी तरह बिगड़े दिल नेता। Go To List ↑

 


नाम-रूप का भेद / काका हाथरसी 

नाम-रूप का भेद / काका हाथरसी 
नाम-रूप का भेद / kaka hathrasi ki hasya kavita

नाम – रूप के भेद पर कभी किया है ग़ौर ?

नाम मिला कुछ और तो शक्ल – अक्ल कुछ और

 शक्ल – अक्ल कुछ और नयनसुख देखे काने

 बाबू सुंदरलाल बनाये ऐंचकताने

 कहँ ‘ काका कवि , दयाराम जी मारें मच्छर

 विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर

 मुंशी चंदालाल का तारकोल सा रूप

 श्यामलाल का रंग है जैसे खिलती धूप

 जैसे खिलती धूप , सजे बुश्शर्ट पैंट में –

ज्ञानचंद छै बार फ़ेल हो गये टैंथ में

 कहँ ‘ काका ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे

 पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे

 देख अशर्फ़ीलाल के घर में टूटी खाट

 सेठ भिखारीदास के मील चल रहे आठ

 मील चल रहे आठ , करम के मिटें न लेखे

 धनीराम जी हमने प्रायः निर्धन देखे

 कहँ ‘ काका कवि , दूल्हेराम मर गये कुँवारे

 बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बेचारे

 पेट न अपना भर सके जीवन भर जगपाल

 बिना सूँड़ के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल

 मिलें गणेशीलाल , पैंट की क्रीज़ सम्हारी

 बैग कुली को दिया , चले मिस्टर गिरधारी

 कहँ ‘ काका कविराय , करें लाखों का सट्टा

 नाम हवेलीराम किराये का है अट्टा

 चतुरसेन बुद्धू मिले , बुद्धसेन निर्बुद्ध

 श्री आनंदीलाल जी रहें सर्वदा क्रुद्ध

 रहें सर्वदा क्रुद्ध , मास्टर चक्कर खाते

 इंसानों को मुंशी तोताराम पढ़ाते

 कहँ ‘ काका , बलवीर सिंह जी लटे हुये हैं

 थानसिंह के सारे कपड़े फटे हुये हैं

 बेच रहे हैं कोयला , लाला हीरालाल

 सूखे गंगाराम जी , रूखे मक्खनलाल

 रूखे मक्खनलाल , झींकते दादा – दादी

 निकले बेटा आशाराम निराशावादी

 कहँ ‘ काका कवि , भीमसेन पिद्दी से दिखते

 कविवर ‘ दिनकर ’ छायावदी कविता लिखते

 तेजपाल जी भोथरे , मरियल से मलखान

 लाला दानसहाय ने करी न कौड़ी दान

 करी न कौड़ी दान , बात अचरज की भाई

 वंशीधर ने जीवन – भर वंशी न बजाई

 कहँ ‘ काका कवि , फूलचंद जी इतने भारी

 दर्शन करते ही टूट जाये कुर्सी बेचारी

 खट्टे – खारी – खुरखुरे मृदुलाजी के बैन

 मृगनयनी के देखिये चिलगोजा से नैन

 चिलगोजा से नैन , शांता करतीं दंगा

 नल पर नहातीं , गोदावरी , गोमती , गंगा

 कहँ ‘ काका कवि , लज्जावती दहाड़ रही हैं

 दर्शन देवी लंबा घूँघट काढ़ रही हैं

 अज्ञानी निकले निरे पंडित ज्ञानीराम

 कौशल्या के पुत्र का रक्खा दशरथ नाम

 रक्खा दशरथ नाम , मेल क्या खूब मिलाया

 दूल्हा संतराम को आई दुल्हन माया

‘ काका कोई – कोई रिश्ता बड़ा निकम्मा

 पार्वती देवी हैं शिवशंकर की अम्मा Go To List ↑

 


नगरपालिका वर्णन / काका हाथरसी

पार्टी बंदी हों जहाँ , घुसे अखाड़ेबाज़

 मक्खी , मच्छर , गंदगी का रहता हो राज

 का रहता हो राज , सड़क हों टूटी – फूटी

 नगरपिता मदमस्त , छानते रहते बूटी

 कहँ ‘ काका कविराय , नहीं वह नगरपालिका

 बोर्ड लगा दो उसके ऊपर ‘ नरकपालिका Go To List ↑


जम और जमाई / काका हाथरसी 

जम और जमाई / काका हाथरसी की हास्य कविताएं
जम और जमाई / काका हाथरसी की हास्य कविताएं

बड़ा भयंकर जीव है , इस जग में दामाद

 सास – ससुर को चूस कर, कर देता बरबाद

 कर देता बरबाद , आप कुछ पियो न खाओ

 मेहनत करो , कमाओ , इसको देते जाओ

 कहॅं ‘ काका कविराय , सासरे पहुँची लाली

 भेजो प्रति त्यौहार , मिठाई भर- भर थाली

 लल्ला हो इनके यहाँ , देना पड़े दहेज

 लल्ली हो अपने यहाँ , तब भी कुछ तो भेज

 तब भी कुछ तो भेज , हमारे चाचा मरते

 रोने की एक्टिंग दिखा , कुछ लेकर टरते

‘ काका स्वर्ग प्रयाण करे , बिटिया की सासू

 चलो दक्षिणा देउ और टपकाओ आँसू

 जीवन भर देते रहो , भरे न इनका पेट

 जब मिल जायें कुँवर जी , तभी करो कुछ भेंट

 तभी करो कुछ भेंट , जँवाई घर हो शादी

 भेजो लड्डू , कपड़े, बर्तन, सोना – चाँदी

 कहॅं ‘ काका , हो अपने यहाँ विवाह किसी का

 तब भी इनको देउ , करो मस्तक पर टीका

 कितना भी दे दीजिये , तृप्त न हो यह शख़्श

 तो फिर यह दामाद है अथवा लैटर बक्स ?

अथवा लैटर बक्स , मुसीबत गले लगा ली

 नित्य डालते रहो , किंतु ख़ाली का ख़ाली

 कहँ ‘ काका कवि , ससुर नर्क में सीधा जाता

 मृत्यु – समय यदि दर्शन दे जाये जमाता

 और अंत में तथ्य यह कैसे जायें भूल

 आया हिंदू कोड बिल , इनको ही अनुकूल

 इनको ही अनुकूल , मार कानूनी घिस्सा

 छीन पिता की संपत्ति से , पुत्री का हिस्सा

‘ काका एक समान लगें , जम और जमाई

 फिर भी इनसे बचने की कुछ युक्ति न पाई Go To List ↑

 


हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य

 सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य

 है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-

बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा

 कहँ काका , जो ऐश कर रहे रजधानी में

 नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

 पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस

 हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस

 जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी

 इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी

 कहँ काका कविराय, ध्येय को भेजो लानत

 अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत Go To List ↑

 


पुलिस-महिमा / काका हाथरसी

पड़ा – पड़ा क्या कर रहा , रे मूरख नादान

 दर्पण रख कर सामने , निज स्वरूप पहचान

 निज स्वरूप पह्चान , नुमाइश मेले वाले

 झुक – झुक करें सलाम , खोमचे – ठेले वाले

 कहँ ‘ काका कवि , सब्ज़ी – मेवा और इमरती

 चरना चाहे मुफ़्त , पुलिस में हो जा भरती

 कोतवाल बन जाये तो , हो जाये कल्यान

 मानव की तो क्या चले , डर जाये भगवान

 डर जाये भगवान , बनाओ मूँछे ऐसीं

 इँठी हुईं , जनरल अयूब रखते हैं जैसीं

 कहँ ‘ काका , जिस समय करोगे धारण वर्दी

 ख़ुद आ जाये ऐंठ – अकड़ – सख़्ती – बेदर्दी

 शान – मान – व्यक्तित्व का करना चाहो विकास

 गाली देने का करो , नित नियमित अभ्यास

 नित नियमित अभ्यास , कंठ को कड़क बनाओ

 बेगुनाह को चोर , चोर को शाह बताओ

‘ काका , सीखो रंग – ढंग पीने – खाने के

‘ रिश्वत लेना पाप लिखा बाहर थाने के Go To List ↑

 


दहेज की बारात / काका हाथरसी

दहेज की बारात / काका हाथरसी / kaka hathrasi poem
दहेज की बारात / काका हाथरसी / kaka hathrasi poem

जा दिन एक बारात को मिल्यौ निमंत्रण-पत्र

 फूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्र

 यत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटी

 बा दिन अच्छी नाहिं लगी अपने घर रोटी

 कहँ काका कविराय, लार म्हौंड़े सों टपके

 कर लड़ुअन की याद, जीभ स्याँपन सी लपके

 मारग में जब है गई अपनी मोटर फ़ेल

 दौरे स्टेशन, लई तीन बजे की रेल

 तीन बजे की रेल, मच रही धक्कम-धक्का

 दो मोटे गिर परे, पिच गये पतरे कक्का

 कहँ काका कविराय, पटक दूल्हा ने खाई

 पंडितजू रह गये, चढ़ि गयौ ननुआ नाई

 नीचे को करि थूथरौ, ऊपर को करि पीठ

 मुर्गा बनि बैठे हमहुँ, मिली न कोऊ सीट

 मिली न कोऊ सीट, भीर में बनिगौ भुरता

 फारि लै गयौ कोउ हमारो आधौ कुर्ता

 कहँ काका कविराय, परिस्थिति विकट हमारी

 पंडितजी रहि गये, उन्हीं पे टिकस हमारी

 फक्क-फक्क गाड़ी चलै, धक्क-धक्क जिय होय

 एक पन्हैया रह गई, एक गई कहुँ खोय

 एक गई कहुँ खोय, तबहिं घुस आयौ टी-टी

 मांगन लाग्यौ टिकस, रेल ने मारी सीटी

 कहँ काका , समझायौ पर नहिं मान्यौ भैया

 छीन लै गयौ, तेरह आना तीन रुपैया

 जनमासे में मच रह्यौ, ठंडाई को सोर

 मिर्च और सक्कर दई, सपरेटा में घोर

 सपरेटा में घोर, बराती करते हुल्लड़

 स्वादि-स्वादि में खेंचि गये हम बारह कुल्हड़

 कहँ काका कविराय, पेट हो गयौ नगाड़ौ

 निकरौसी के समय हमें चढ़ि आयौ जाड़ौ

 बेटावारे ने कही, यही हमारी टेक

 दरबज्जे पे ले लऊँ नगद पाँच सौ एक

 नगद पाँच सौ एक, परेंगी तब ही भाँवर

 दूल्हा करिदौ बंद, दई भीतर सौं साँकर

 कहँ काका कवि, समधी डोलें रूसे-रूसे

 अर्धरात्रि है गई, पेट में कूदें मूसे

 बेटीवारे ने बहुत जोरे उनके हाथ

 पर बेटा के बाप ने सुनी न कोऊ बात

 सुनी न कोऊ बात, बराती डोलें भूखे

 पूरी-लड़ुआ छोड़, चना हू मिले न सूखे

 कहँ काका कविराय, जान आफत में आई

 जम की भैन बरात, कहावत ठीक बनाई

 समधी-समधी लड़ि परै, तै न भई कछु बात

 चलै घरात-बरात में थप्पड़- घूँसा-लात

 थप्पड़- घूँसा-लात, तमासौ देखें नारी

 देख जंग को दृश्य, कँपकँपी बँधी हमारी

 कहँ काका कवि, बाँध बिस्तरा भाजे घर को

 पीछे सब चल दिये, संग में लैकें वर को

 मार भातई पै परी, बनिगौ वाको भात

 बिना बहू के गाम कों, आई लौट बरात

 आई लौट बरात, परि गयौ फंदा भारी

 दरबज्जै पै खड़ीं, बरातिन की घरवारीं

 कहँ काकी ललकार, लौटकें वापिस जाऔ

 बिना बहू के घर में कोऊ घुसन न पाऔ

 हाथ जोरि माँगी क्षमा, नीची करकें मोंछ

 काकी ने पुचकारिकें, आँसू दीन्हें पोंछ

 आँसू दीन्हें पोंछ, कसम बाबा की खाई

 जब तक जीऊँ, बरात न जाऊँ रामदुहाई

 कहँ काका कविराय, अरे वो बेटावारे

 अब तो दै दै, टी-टी वारे दाम हमारे Go To List ↑

 


सुरा समर्थन / काका हाथरसी

भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान

 देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान

 किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर

 जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं कायर

कहँ काका , कवि बच्चन ने पीकर दो प्याला

 दो घंटे में लिख डाली, पूरी मधुशाला

भेदभाव से मुक्त यह, क्या ऊँचा क्या नीच

 अहिरावण पीता इसे, पीता था मारीच

 पीता था मारीच, स्वर्ण- मृग रूप बनाया

 पीकर के रावण सीता जी को हर लाया

 कहँ काका कविराय, सुरा की करो न निंदा

 मधु पीकर के मेघनाद पहुँचा किष्किंधा

 ठेला हो या जीप हो, अथवा मोटरकार

 ठर्रा पीकर छोड़ दो, अस्सी की रफ़्तार

 अस्सी की रफ़्तार, नशे में पुण्य कमाओ

 जो आगे आ जाये, स्वर्ग उसको पहुँचाओ

 पकड़ें यदि सार्जेंट, सिपाही ड्यूटी वाले

 लुढ़का दो उनके भी मुँह में, दो चार पियाले

 पूरी बोतल गटकिये, होय ब्रह्म का ज्ञान

 नाली की बू, इत्र की खुशबू एक समान

 खुशबू एक समान, लड़्खड़ाती जब जिह्वा

 डिब्बा कहना चाहें, निकले मुँह से दिब्बा

कहँ काका कविराय, अर्ध-उन्मीलित अँखियाँ

 मुँह से बहती लार, भिनभिनाती हैं मखियाँ

 प्रेम-वासना रोग में, सुरा रहे अनुकूल

 सैंडिल-चप्पल-जूतियां, लगतीं जैसे फूल

 लगतीं जैसे फूल, धूल झड़ जाये सिर की

 बुद्धि शुद्ध हो जाये, खुले अक्कल की खिड़की

 प्रजातंत्र में बिता रहे क्यों जीवन फ़ीका

 बनो पियक्कड़चंद , स्वाद लो आज़ादी का

 एक बार मद्रास में देखा जोश-ख़रोश

 बीस पियक्कड़ मर गये, तीस हुये बेहोश

 तीस हुये बेहोश, दवा दी जाने कैसी

 वे भी सब मर गये, दवाई हो तो ऐसी

 चीफ़ सिविल सर्जन ने केस कर दिया डिसमिस

 पोस्ट मार्टम हुआ, पेट में निकली वार्निश Go To List ↑

 


घूस माहात्म्य / काका हाथरसी 

घूस माहात्म्य / काका हाथरसी / काका हाथरसी की कविताएं 
घूस माहात्म्य / काका हाथरसी / काका हाथरसी की कविताएं

कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार

 ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार

 बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी

 माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी

 कहँ काका , क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा

 जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा Go To List ↑

 


तेली कौ ब्याह / काका हाथरसी

भोलू तेली गाँव में, करै तेल की सेल

 गली-गली फेरी करै, तेल लेऊ जी तेल

 तेल लेऊ जी तेल , कड़कड़ी ऐसी बोली

 बिजुरी तड़कै अथवा छूट रही हो गोली

 कहँ काका कवि कछुक दिना सन्नाटौ छायौ

 एक साल तक तेली नहीं गाँव में आयो

 मिल्यौ अचानक एक दिन, मरियल बा की चाल

 काया ढीली पिलपिली, पिचके दोऊ गाल

 पिचके दोऊ गाल, गैल में धक्का खावै

 तेल लेऊ जी तेल , बकरिया सौ मिमियावै

 पूछी हमने जे कहा हाल है गयौ तेरौ

 भोलू बोलो, काका ब्याह है गयौ मेरौ Go To List ↑


मुर्ग़ी और नेता / काका हाथरसी

नेता अखरोट से बोले किसमिस लाल

 हुज़ूर हल कीजिये मेरा एक सवाल

 मेरा एक सवाल, समझ में बात न भरती

 मुर्ग़ी अंडे के ऊपर क्यों बैठा करती

 नेता ने कहा, प्रबंध शीघ्र ही करवा देंगे

 मुर्ग़ी के कमरे में एक कुर्सी डलवा देंगे Go To List ↑

 


कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ / काका हाथरसी

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ / काका हाथरसी की कविताएं
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ / काका हाथरसी की कविताएं

प्रकृति बदलती क्षण-क्षण देखो,

बदल रहे अणु, कण-कण देखो|

तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो |

भाग्य वाद पर अड़े हुए हो|

छोड़ो मित्र ! पुरानी डफली,

जीवन में परिवर्तन लाओ |

परंपरा से ऊंचे उठ कर,

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

जब तक घर मे धन संपति हो,

बने रहो प्रिय आज्ञाकारी |

पढो, लिखो, शादी करवा लो ,

फिर मानो यह बात हमारी |

माता पिता से काट कनेक्शन,

अपना दड़बा अलग बसाओ |

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

करो प्रार्थना, हे प्रभु हमको,

पैसे की है सख़्त ज़रूरत |

अर्थ समस्या हल हो जाए,

शीघ्र निकालो ऐसी सूरत |

हिन्दी के हिमायती बन कर,

संस्थाओं से नेह जोड़िये |

किंतु आपसी बातचीत में,

अंग्रेजी की टांग तोड़िये |

इसे प्रयोगवाद कहते हैं,

समझो गहराई में जाओ |

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

कवि बनने की इच्छा हो तो,

यह भी कला बहुत मामूली |

नुस्खा बतलाता हूँ, लिख लो,

कविता क्या है, गाजर मूली |

कोश खोल कर रख लो आगे,

क्लिष्ट शब्द उसमें से चुन लो|

उन शब्दों का जाल बिछा कर,

चाहो जैसी कविता बुन लो |

श्रोता जिसका अर्थ समझ लें,

वह तो तुकबंदी है भाई |

जिसे स्वयं कवि समझ न पाए,

वह कविता है सबसे हाई |

इसी युक्ती से बनो महाकवि,

उसे नई कविता बतलाओ |

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

चलते चलते मेन रोड पर,

फिल्मी गाने गा सकते हो |

चौराहे पर खड़े खड़े तुम,

चाट पकोड़ी खा सकते हो |

बड़े चलो उन्नति के पथ पर,

रोक सके किस का बल बूता?

यों प्रसिद्ध हो जाओ जैसे,

भारत में बाटा का जूता |

नई सभ्यता, नई संस्कृति,

के नित चमत्कार दिखलाओ |

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

पिकनिक का जब मूड बने तो,

ताजमहल पर जा सकते हो |

शरद-पूर्णिमा दिखलाने को,

 उन्हें साथ ले जा सकते हो |

वे देखें जिस समय चंद्रमा,

तब तुम निरखो सुघर चाँदनी |

फिर दोनों मिल कर के गाओ,

मधुर स्वरों में मधुर रागिनी |

 ( तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी ..)

आलू छोला, कोका-कोला,

 उनका भोग लगा कर पाओ |

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ|


मोटी पत्नी / काका हाथरसी

ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल

 किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फ़ुटबौल

 लिखी ठौस फ़ुटबौल, न करती घर का धंधा

 आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा

 कहँ ‘ काका कविराय , खाय वह ठूँसमठूँसा

 यदि ऊपर गिर पड़े, बना दे पति का भूसा Go To List ↑

 


पंचभूत / काका हाथरसी 

पंचभूत / काका हाथरसी / kaka hathrasi poems in hindi
पंचभूत / काका हाथरसी / kaka hathrasi poems in hindi

भाँड़, भतीजा, भानजा, भौजाई, भूपाल

 पंचभूत की छूत से, बच व्यापार सम्हाल

 बच व्यापार सम्हाल, बड़े नाज़ुक ये नाते

 इनको दिया उधार, समझ ले बट्टे खाते

‘काका परम प्रबल है इनकी पाचन शक्ती

 जब माँगोगे, तभी झाड़ने लगें दुलत्ती Go To List ↑

 


पिल्ला / काका हाथरसी

पिल्ला बैठा कार में, मानुष ढोवें बोझ

 भेद न इसका मिल सका, बहुत लगाई खोज

 बहुत लगाई खोज, रोज़ साबुन से न्हाता

 देवी जी के हाथ, दूध से रोटी खाता

 कहँ काका कवि, माँगत हूँ वर चिल्ला-चिल्ला

 पुनर्जन्म में प्रभो! बनाना हमको पिल्ला Go To List ↑

 


भ्रष्टाचार / काका हाथरसी

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर

‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर

 पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला

 खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला

 कहँ ‘काका कवि, करके बंद धरम का काँटा

 लाला बोले – भागो, खत्म हो गया आटा Go To List ↑

 


खटमल-मच्छर-युद्ध / काका हाथरसी

 काका वेटिंग रूम में फँसे देहरादून ।

 नींद न आई रात भर, मच्छर चूसें खून ॥

 मच्छर चूसें खून, देह घायल कर डाली ।

 हमें उड़ा ले ज़ाने की योजना बना ली ॥

 किंतु बच गए कैसे, यह बतलाएँ तुमको ।

 नीचे खटमल जी ने पकड़ रखा था हमको ॥

 हुई विकट रस्साकशी, थके नहीं रणधीर ।

 ऊपर मच्छर खींचते नीचे खटमल वीर ॥

 नीचे खटमल वीर, जान संकट में आई ।

 घिघियाए हम- जै जै जै हनुमान गुसाईं ॥

 पंजाबी सरदार एक बोला चिल्लाके – |

त्व्हाणूँ पजन करना होवे तो करो बाहर जाके ॥ Go To List ↑

 


सारे जहाँ से अच्छा / काका हाथरसी 

सारे जहाँ से अच्छा / काका हाथरसी  / kaka hathrasi ki hasya kavita
सारे जहाँ से अच्छा / काका हाथरसी  / kaka hathrasi ki hasya kavita

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा

 हम भेड़-बकरी इसके यह गड़ेरिया हमारा

 सत्ता की खुमारी में, आज़ादी सो रही है

 हड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही है

 लेकर के कर्ज़ खाओ यह फर्ज़ है तुम्हारा

 सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैं

 ईमान के मुसाफिर राशन को तरशते हैं

 वोटर से वोट लेकर वे कर गए किनारा

 सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

जब अंतरात्मा का मिलता है हुक्म काका

 तब राष्ट्रीय पूँजी पर वे डालते हैं डाका

 इनकम बहुत ही कम है होता नहीं गुज़ारा

 सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

हिन्दी के भक्त हैं हम, जनता को यह जताते

 लेकिन सुपुत्र अपना कांवेंट में पढ़ाते

 बन जाएगा कलक्टर देगा हमें सहारा

 सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

फ़िल्मों पे फिदा लड़के, फैशन पे फिदा लड़की

 मज़बूर मम्मी-पापा, पॉकिट में भारी कड़की

 बॉबी को देखा जबसे बाबू हुए अवारा

 सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

जेवर उड़ा के बेटा, मुम्बई को भागता है

 ज़ीरो है किंतु खुद को हीरो से नापता है

 स्टूडियो में घुसने पर गोरखा ने मारा

 सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा. Go To List ↑

 


अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार / काका हाथरसी

बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर

 जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर

 खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू

 पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू

 गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना

 प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना Go To List ↑

 


एअर कंडीशन नेता / काका हाथरसी

वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय।

 काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय॥

 मैं अपनी त्याग-तपस्या से जनगण को मार्ग दिखाता हूँ।

 है कमी अन्न की इसीलिए चमचम-रसगुल्ले खाता हूँ॥

 गीता से ज्ञान मिला मुझको, मँज गया आत्मा का दर्पण।

 निर्लिप्त और निष्कामी हूँ, सब कर्म किए प्रभु के अर्पण॥

 आत्मोन्नति के अनुभूत योग, कुछ तुमको आज बताऊँगा।

 हूँ सत्य-अहिंसा का स्वरूप, जग में प्रकाश फैलाऊँगा॥

 आई स्वराज की बेला तब, सेवा-व्रत हमने धार लिया।

 दुश्मन भी कहने लगे दोस्त! मैदान आपने मार लिया॥

 जब अंतःकरण हुआ जाग्रत, उसने हमको यों समझाया।

 आँधी के आम झाड़ मूरख क्षणभंगुर है नश्वर काया॥

 गृहणी ने भृकुटी तान कहा-कुछ अपना भी उद्धार करो।

 है सदाचार क अर्थ यही तुम सदा एक के चार करो॥

 गुरु भ्रष्टदेव ने सदाचार का गूढ़ भेद यह बतलाया।

 जो मूल शब्द था सदाचोर, वह सदाचार अब कहलाया॥

 गुरुमंत्र मिला आई अक्कल उपदेश देश को देता मैं।

 है सारी जनता थर्ड क्लास, एअरकंडीशन नेता मैं॥

 जनता के संकट दूर करूँ, इच्छा होती, मन भी चलता।

 पर भ्रमण और उद्घाटन-भाषण से अवकाश नहीं मिलता॥

 आटा महँगा, भाटे महँगे, महँगाई से मत घबराओ।

 राशन से पेट न भर पाओ, तो गाजर शकरकन्द खाओ॥

 ऋषियों की वाणी याद करो, उन तथ्यों पर विश्वास करो।

 यदि आत्मशुद्धि करना चाहो, उपवास करो, उपवास करो॥

 दर्शन-वेदांत बताते हैं, यह जीवन-जगत अनित्या है।

 इसलिए दूध, घी, तेल, चून, चीनी, चावल, सब मिथ्या है॥

 रिश्वत अथवा उपहार-भेंट मैं नहीं किसी से लेता हूँ।

 यदि भूले भटके ले भी लूँ तो कृष्णार्पण कर देता हूँ॥

 ले भाँति-भाँति की औषधियाँ, शासक-नेता आगे आए।

 भारत से भ्रष्टाचार अभी तक दूर नहीं वे कर पाए॥

 अब केवल एक इलाज शेष, मेरा यह नुस्खा नोट करो।

 जब खोट करो, मत ओट करो, सब कुछ डंके की चोट करो॥ Go To List ↑

 



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