केदारनाथ सिंह की कविता / Kedarnath Singh Poems In Hindi

केदारनाथ सिंह की सभी कविताओ को हमने आपके सामने यहॉ प्रस्तुत की है जिसे आप अपने इच्छा अनुसार पढ़ और देख सकते है ।

नीचे दी गई Kedarnath Singh Poems को पढ़े और हमे बताये आपको केदारनाथ सिंह की सभी कविताओ का संग्रह कैसा लगा ।

तो चलिए बिना किसी तरह के विलम्ब के kedarnath singh ki kavita शुरूवात करते है ।

विषय सूची

मंच और मचान (लम्बी कविता) / केदारनाथ सिंह 

मंच और मचान (लम्बी कविता) | केदारनाथ सिंह
मंच और मचान / kedarnath singh ki kavita

पत्तों की तरह बोलते

तने की तरह चुप

एक ठिंगने से चीनी भिक्खु थे वे

जिन्हें उस जनपद के लोग कहते थे

चीना बाबा

कब आए थे रामाभार स्तूप पर

यह कोई नहीं जानता था

पर जानना जरूरी भी नहीं था

उनके लिए तो बस इतना ही बहुत था

कि वहाँ स्तूप पर खड़ा है

चिड़ियों से जगरमगर एक युवा बरगद

बरगद पर मचान है

और मचान पर रहते हैं वे

जाने कितने समय से

अगर भूलता नहीं तो यह पिछली सदी के

पाँचवें दशक का कोई एक दिन था

जब सड़क की ओर से भोंपू की आवाज आई

 भाइयो और बहनो,

प्रधानमंत्री आ रहे हैं स्तूप को देखने…

प्रधानमंत्री!

खिल गए लोग

जैसे कुछ मिल गया हो सुबह सुबह

पर कैसी विडंबना

कि वे जो लोग थे

सिर्फ नेहरू को जानते थे

प्रधानमंत्री को नहीं!

सो इस शब्द के अर्थ तक पहुँचने में

उन्हें काफी दिक्कत हुई

फिर भी सुर्ती मलते और बोलते बतियाते

पहुँच ही गए वे वहाँ तक

कहाँ तक?

यह कहना मुश्किल है

कहते हैं- प्रधानमंत्री आये

उन्होंने चारों ओर घूम कर देखा स्तूप को

फिर देखा बरगद को

जो खड़ा था स्तूप पर

पर न जाने क्यों

वे हो गए उदास

(और कहते हैं- नेहरू अक्सर

उदास हो जाते थे)

फिर जाते जाते एक अधिकारी को

पास बुलाया

कहा- देखो- उस बरगद को गौर से देखो

उसके बोझ से टूट कर

गिर सकता है स्तूप

इसलिए हुक्म है कि देशहित में

काट डालो बरगद

और बचा लो स्तूप को

यह राष्ट्र के भव्यतम मंच का आदेश था

जाने अनजाने एक मचान के विरुद्ध

इस तरह उस दिन एक अद्भुत घटना घटी

भारत के इतिहास में

कि मंच और मचान

यानी एक ही शब्द के लंबे इतिहास के

दोनों ओरछोर

अचानक आ गए आमने सामने

अगले दिन

सूर्य के घंटे की पहली चोट के साथ

स्तूप पर आ गए-

बढ़ई

मजूर

इंजीनियर

कारीगर

आ गए लोग दूर दूर से

इधर अधिकारी परेशान

क्योंकि उन्हें पता था

खाली नहीं है बरगद

कि उस पर एक मचान है

और मचान भी खाली नहीं

क्योंकि उस पर रहता है एक आदमी

और खाली नहीं आदमी भी

क्योंकि वह जिंदा है

और बोल सकता है

क्या किया जाय?

हुक्म दिल्ली का

और समस्या जटिल

देर तक खड़े-खड़े सोचते रहे वे

कि सहसा किसी एक ने

हाथ उठा प्रार्थना की-

 चीना बाबा,

ओ ओ चीना बाबा!

नीचे उतर आओ

बरगद काटा जायेगा

 काटा जाएगा?

क्यों? लेकिन क्यों?

जैसे पत्तों से फूट कर जड़ों की आवाज आई

 ऊपर का आदेश है-

नीचे से उतर गया

 तो शुनो, – भिक्खु अपनी चीनी गमक वाली

हिंदी में बोला,

 चाये काट डालो मुझी को

उतरूँगा नईं

ये मेरा घर है!

भिक्खु की आवाज में

बरगद के पत्तों के दूध का बल था

अब अधिकारियों के सामने

एक विकट सवाल था- एकदम अभूतपूर्व

पेड़ है कि घर- –

यह एक ऐसा सवाल था

जिस पर कानून चुप था

इस पर तो कविताएं भी चुप हैं

एक कविता प्रेमी अधिकारी ने

धीरे से टिप्पणी की

देर तक

दूर तक जब कुछ नहीं सूझा

तो अधिकारियों ने राज्य के उच्चतम

अधिकारी से संपर्क किया

और गहन छानबीन के बाद पाया गया-

मामला भिक्खु के चीवर सा

बरगद की लंबी बरोहों से उलझ गया है

हार कर पाछ कर अंततः तय हुआ

दिल्ली से पूछा जाय

और कहते हैं-

दिल्ली को कुछ भी याद नहीं था

न हुक्म

न बरगद

न दिन

न तारीख

कुछ भी – कुछ भी याद ही नहीं था

पर जब परतदरपरत

इधर से बताई गई स्थिति की गंभीरता

और उधर लगा कि अब भिक्खु का घर

यानी वह युवा बरगद

कुल्हाड़े की धार से बस कुछ मिनट दूर है

तो खयाल है कि दिल्ली ने जल्दी जल्दी

दूत के जरिए बीजिंग से बात की

इस हल्की सी उम्मीद में कि शायद

कोई रास्ता निकल आये

एक कयास यह भी

कि बात शायद माओ की मेज तक गयी

अब यह कितना सही है

कितना गलत

साक्ष्य नहीं कोई कि जाँच सकूँ इसे

पर मेरा मन कहता है काश यह सच हो

कि उस दिन

विश्व में पहली बार दो राष्ट्रों ने

एक पेड़ के बारे में बातचीत की

 -तो पाठकगण

यह रहा एक धुँधला सा प्रिंटआउट

उन लोगों की स्मृति का

जिन्हें मैंने खो दिया था बरसों पहले

और छपतेछपते इतना और

कि हुक्म की तामील तो होनी ही थी

सो जैसेतैसे पुलिस के द्वारा

बरगद से नीचे उतारा गया भिक्खु को

और हाथ उठाए – मानो पूरे ब्रह्मांड में

चिल्लाता रहा वह-

 घर है…ये…ये….मेरा घर है

पर जो भी हो

अब मौके पर मौजूद टाँगों कुल्हाड़ों का

रास्ता साफ था

एक हल्का सा इशारा और ठक्‌ …ठक्‌

गिरने लगे वे बरगद की जड़ पर

पहली चोट के बाद ऐसा लगा

जैसे लोहे ने झुक कर

पेड़ से कहा हो- माफ करना भाई,

कुछ हुक्म ही ऐसा है

और ठक्‌ ठक्‌ गिरने लगा उसी तरह

उधर फैलती जा रही थी हवा में

युवा बरगद के कटने की एक कच्ची गंध

और नहीं…नहीं…

कहीं से विरोध में आती थी एक बुढ़िया की आवाज

और अगली ठक्‌ के नीचे दब जाती थी

जाने कितनी चहचह

कितने पर

कितनी गाथाएँ

कितने जातक

दब जाते थे हर ठक्‌ के नीचे

चलता रहा वह विकट संगीत

जाने कितनी देर तक

-कि अचानक

जड़ों के भीतर एक कड़क सी हुई

और लोगों ने देखा कि चीख न पुकार

बस झूमता झामता एक शाहाना अंदाज में

अरअराकर गिर पड़ा समूचा बरगद

सिर्फ घर – वह शब्द

देर तक उसी तरह

टँगा रहा हवा में

तब से कितना समय बीता

मैंने कितने शहर नापे

कितने घर बदले

और हैरान हूँ मुझे लग गया इतना समय

इस सच तक पहुँचने में

कि उस तरह देखो

तो हुक्म कोई नहीं

पर घर जहाँ भी है

उसी तरह टँगा है. Go To List ↑

 


झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की / केदारनाथ सिंह 

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की / केदारनाथ सिंह 
झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की / केदारनाथ सिंह / kedarnath singh poems

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से

झुर-झुर सरसों की रंगीनी,

धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —

सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए

लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,

चिलबिल की नंगी बाँहों में —

भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को चुर-मुर ध्वनि बाँसों के वन की ।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,

रुक कर सहम गई चौबाई,

आँखों के इस वीराने में —

और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की । Go To List ↑

 


विद्रोह / केदारनाथ सिंह

आज घर में घुसा

तो वहाँ अजब दृश्य था

सुनिए — मेरे बिस्तर ने कहा —

यह रहा मेरा इस्तीफ़ा

मैं अपने कपास के भीतर

वापस जाना चाहता हूँ

उधर कुर्सी और मेज़ का

एक सँयुक्त मोर्चा था

दोनों तड़पकर बोले —

जी, अब बहुत हो चुका

आपको सहते-सहते

हमें बेतरह याद आ रहे हैं

हमारे पेड़

और उनके भीतर का वह

ज़िन्दा द्रव

जिसकी हत्या कर दी है

आपने

उधर आलमारी में बन्द

क़िताबें चिल्ला रही थीं

खोल दो, हमें खोल दो

हम जाना चाहती हैं अपने

बाँस के जंगल

और मिलना चाहती हैं

अपने बिच्छुओं के डंक

और साँपों के चुम्बन से

पर सबसे अधिक नाराज़ थी

वह शॉल

जिसे अभी कुछ दिन पहले कुल्लू से ख़रीद लाया था

बोली — साहब!

आप तो बड़े साहब निकले

मेरा दुम्बा भेड़ा मुझे कब से

पुकार रहा है

और आप हैं कि अपनी देह

की क़ैद में

लपेटे हुए हैं मुझे

उधर टी० वी० और फ़ोन का

बुरा हाल था

ज़ोर-ज़ोर से कुछ कह रहे थे

वे

पर उनकी भाषा

मेरी समझ से परे थी

कि तभी

नल से टपकता पानी तड़पा —

अब तो हद हो गई साहब!

अगर सुन सकें तो सुन

लीजिए

इन बूँदों की आवाज़ —

कि अब हम

यानी आपके सारे के सारे

क़ैदी

आदमी की जेल से

मुक्त होना चाहते हैं

अब जा कहाँ रहे हैं —

मेरा दरवाज़ा कड़का

जब मैं बाहर निकल रहा था। Go To List ↑

 


हाथ / केदारनाथ सिंह

उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए. Go To List ↑

 


जाना / केदारनाथ सिंह

जाना / केदारनाथ सिंह / केदारनाथ सिंह की कविता
जाना / केदारनाथ सिंह / केदारनाथ सिंह की कविता

मैं जा रही हूँ – उसने कहा

जाओ – मैंने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है. Go To List ↑

 


दिशा / केदारनाथ सिंह

हिमालय किधर है?

मैंने उस बच्‍चे से पूछा जो स्‍कूल के बाहर

पतंग उड़ा रहा था

उधर-उधर-उसने कहाँ

जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी

मैं स्‍वीकार करूँ

मैंने पहली बार जाना

हिमालय किधर है? Go To List ↑

 


नए कवि का दुख / केदारनाथ सिंह

दुख हूँ मैं एक नये हिन्दी कवि का

बाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय, किस छन्द में?

ये छोटे छोटे घर

ये बौने दरवाजे

ताले ये इतने पुराने

और साँकल इतनी जर्जर

आसमान इतना जरा सा

और हवा इतनी कम कम

नफरतयह इतनी गुमसुम सी

और प्यार यह इतना अकेला

और गोल -मोल

बाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय , किस छन्द में?

क्या जीवन इसी तरह बीतेगा

शब्दों से शब्दों तक

जीने

और जीने और जीने ‌‌और जीने के

लगातार द्वन्द में? Go To List ↑


बनारस / केदारनाथ सिंह 

बनारस - केदारनाथ सिंह
बनारस – केदारनाथ सिंह

इस शहर में वसंत

अचानक आता है

और जब आता है तो मैंने देखा है

लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से

उठता है धूल का एक बवंडर

और इस महान पुराने शहर की जीभ

किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है

जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ

आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है

और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर

कुछ और मुलायम हो गया है

सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में

एक अजीब सी नमी है

और एक अजीब सी चमक से भर उठा है

भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है

खाली कटोरों में वसंत का उतरना!

यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता

और खाली होता है यह शहर

इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव

ले जाते हैं कंधे

अँधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरफ़

इस शहर में धूल

धीरे-धीरे उड़ती है

धीरे-धीरे चलते हैं लोग

धीरे-धीरे बजते हैं घनटे

शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना

धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय

दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को

इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है

कि हिलता नहीं है कुछ भी

कि जो चीज़ जहाँ थी

वहीं पर रखी है

कि गंगा वहीं है

कि वहीं पर बँधी है नाँव

कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ

सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ

बिना किसी सूचना के

घुस जाओ इस शहर में

कभी आरती के आलोक में

इसे अचानक देखो

अद्भुत है इसकी बनावट

यह आधा जल में है

आधा मंत्र में

आधा फूल में है

आधा शव में

आधा नींद में है

आधा शंख में

अगर ध्‍यान से देखो

तो यह आधा है

और आधा नहीं भी है

जो है वह खड़ा है

बिना किसी स्‍थंभ के

जो नहीं है उसे थामें है

राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ

आग के स्‍थंभ

और पानी के स्‍थंभ

धुऍं के

खुशबू के

आदमी के उठे हुए हाथों के स्‍थंभ

किसी अलक्षित सूर्य को

देता हुआ अर्घ्‍य

शताब्दियों से इसी तरह

गंगा के जल में

अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर

अपनी दूसरी टाँग से

बिलकुल बेखबर! Go To List ↑

 


तुम आयीं / केदारनाथ सिंह 

तुम आयीं - केदारनाथ सिंह  / केदारनाथ सिंह की कविता
तुम आयीं – केदारनाथ सिंह  / केदारनाथ सिंह की कविता

तुम आयीं

जैसे छीमियों में धीरे- धीरे

आता है रस

जैसे चलते – चलते एड़ी में

काँटा जाए धँस

तुम दिखीं

जैसे कोई बच्चा

सुन रहा हो कहानी

तुम हँसी

जैसे तट पर बजता हो पानी

तुम हिलीं

जैसे हिलती है पत्ती

जैसे लालटेन के शीशे में

काँपती हो बत्ती !

तुमने छुआ

जैसे धूप में धीरे- धीरे

उड़ता है भुआ

और अन्त में

जैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों को

तुमने मुझे पकाया

और इस तरह

जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से

तुमने मुझे खुद से अलगाया । Go To List ↑

 


बुनाई का गीत / केदारनाथ सिंह

उठो सोये हुए धागों

उठो

उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है

उठो कि धोबी पहुँच गया घाट पर

उठो कि नंगधड़ंग बच्चे

जा रहे हैं स्कूल

उठो मेरी सुबह के धागो

और मेरी शाम के धागों उठो

उठो कि ताना कहीं फँस रहा है

उठो कि भरनी में पड़ गई गाँठ

उठो कि नाव के पाल में

कुछ सूत कम पड़ रहे हैं

उठो

झाड़न में

मोजो में

टाट में

दरियों में दबे हुए धागो उठो

उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है

उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा

फिर से बुनना होगा

उठो मेरे टूटे हुए धागो

और मेरे उलझे हुए धागो उठो

उठो

कि बुनने का समय हो रहा है Go To List ↑

 


शहरबदल / केदारनाथ सिंह

वह एक छोटा-सा शहर था

जिसे शायद आप नहीं जानते

पर मैं ही कहाँ जानता था वहाँ जाने से पहले

कि दुनिया के नक्शे में कहाँ है वह।

लेकिन दुनिया शायद उन्हीं छोटे-छोटे शहरों के

ताप से चलती है

जिन्हें हम-आप नहीं जानते।

जाने को तो मैं जा सकता था कहीं भी

क्या बुरा था भैंसालोटन ?

हर्ज़ क्या था गया या गुंटूर जाने में

पर गया मैं गया नहीं

( वैसे भी संन्यास मैंने नहीं लिया था )

कलकत्ते से मिला नहीं छंद

जयपुर जा सकता था

पर गालता के पत्थरों ने खींचा नहीं मुझे

शहर अनेक थे जिनके नामों का ज़ादू

उन युवा दिनों में

प्याज़ की छौंक की तरह खींचता था मुझे

पर हुआ यों कि उन नामों के बारे में

सोचते-सोचते

जब एक दिन थक गया

तो अटैची उठाई

और चप्पल फटकारते हुए

चल दिया पडरौना — उसी शहर में

जिसके नाम का उच्चारण

एक लड़की को लगता था ऊँट के कोहान की तरह

अब इतने दिनों बाद

कभी-कभार सोचता हूँ

मैं क्यों गया पडरौना ?

कोई क्यों जाता है कहीं भी

अपने शहर को छोड़कर —

यह एक ऐसा रहस्य है

जिसके सामने एक शाम ठिठक गए थे ग़ालिब

लखनऊ पहुँचकर।

पर जो सच है वह सीधा-सा

सादा-सा सच है कि एक सुबह मैं उठा

बनारस को कहा राम-राम

और चल दिया उधर

जिधर हो सकता था पडरौना —

वह गुमनाम-सा शहर

जहाँ एक दर्ज़ी कि मशीन भी इस तरह चलती थी

जैसे सृष्टि के शुरू से चल रही हो उसी तरह

और एक ही घड़ी थी

जिससे चिड़ियों का भी काम चलता था

और आदमी का भी

और समय था कि आराम से पड़ा रहता था

लोगों के कन्धों पर

एक गमछे की तरह।

पर शहर की तरह

उस छोटे-से शहर का भी अपना एक संगीत था

जो अक्सर एक पिपिहिरी से शुरू होता था

और ट्रकों के ताल पर चलता रहता था दिन भर

जिसमें हवा की मुर्कियाँ थीं

और बैलगाड़ियों की मूर्च्छना

और धूल के उठते हुए लंबे आलाप

और एक विलम्बित-सी तान दोपहरी-पसिंजर की

जो अक्सर सूर्यास्त के देर बाद आती थी

इस तरह एक दुर्लभ वाद्यवृन्द-सा

बजता ही रहता था महाजीवन

उस छोटे-से शहर का

जिसकी लय पर चलते हुए

कभी-कभी बेहद झुंझला उठता था मैं

कि वे जो लोग थे उनके घुटनों में

एक ऐसा विकट और अथाह धीरज था

कि शाम के नमक के लिए

सुबह तक खड़े-खड़े कर सकते थे इंतज़ार

नमस्कार ! नमस्कार !

मैं कहता था उनसे

उत्तर में सिर्फ़ हँसते थे वे

जिसमें गूँजता था सदियों का संचित हाहाकार… Go To List ↑

 


जब वर्षा शुरु होती है / केदारनाथ सिंह

जब वर्षा शुरु होती है

कबूतर उड़ना बन्द कर देते हैं

गली कुछ दूर तक भागती हुई जाती है

और फिर लौट आती है

मवेशी भूल जाते हैं चरने की दिशा

और सिर्फ रक्षा करते हैं उस धीमी गुनगुनाहट की

जो पत्तियों से गिरती है

सिप् सिप् सिप् सिप्

जब वर्षा शुरु होती है

एक बहुत पुरानी सी खनिज गंध

सार्वजनिक भवनों से निकलती है

और सारे शहर में छा जाती है

जब वर्षा शुरु होती है

तब कहीं कुछ नहीं होता

सिवा वर्षा के

आदमी और पेड़

जहाँ पर खड़े थे वहीं खड़े रहते हैं

सिर्फ पृथ्वी घूम जाती है उस आशय की ओर

जिधर पानी के गिरने की क्रिया का रुख होता है। Go To List ↑

 


नदी / केदारनाथ सिंह

 अकाल में सारस

अगर धीरे चलो

वह तुम्हे छू लेगी

दौड़ो तो छूट जाएगी नदी

अगर ले लो साथ

वह चलती चली जाएगी कहीं भी

यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी

छोड़ दो

तो वही अंधेरे में

करोड़ों तारों की आँख बचाकर

वह चुपके से रच लेगी

एक समूची दुनिया

एक छोटे से घोंघे में

सच्चाई यह है

कि तुम कहीं भी रहो

तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी

प्यार करती है एक नदी

नदी जो इस समय नहीं है इस घर में

पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं

किसी चटाई

या फूलदान के नीचे

चुपचाप बहती हुई

कभी सुनना

जब सारा शहर सो जाए

तो किवाड़ों पर कान लगा

धीरे-धीरे सुनना

कहीं आसपास

एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह

सुनाई देगी नदी!

रचनाकाल : 1983 Go To List ↑

 


सन् ४७ को याद करते हुए / केदारनाथ सिंह

तुम्हें नूर मियाँ की याद है केदारनाथ सिंह?

गेहुँए नूर मियाँ

ठिगने नूर मियाँ

रामगढ़ बाजार से सुरमा बेच कर

सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियाँ

क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा

इमली का पेड़

इमामबाड़ा

तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक

उन्नीस का पहाड़ा

क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर

जोड़ घटा कर

यह निकाल सकते हो

कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर

क्यों चले गए थे नूर मियाँ?

क्या तुम्हें पता है

इस समय वे कहाँ हैं

ढाका

या मुल्तान में?

क्या तुम बता सकते हो?

हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?

तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह?

क्या तुम्हारा गणित कमजोर है? Go To List ↑

 


फसल / केदारनाथ सिंह 

फसल - केदारनाथ सिंह / kedarnath singh poems
फसल – केदारनाथ सिंह / kedarnath singh poems

मैं उसे बरसों से जानता था–

एक अधेड़ किसान

थोड़ा थका

थोड़ा झुका हुआ

किसी बोझ से नहीं

सिर्फ़ धरती के उस सहज गुरुत्वाकर्षं से

जिसे वह इतना प्यार करता था

वह मानता था–

दुनिया में कुत्ते बिल्लियाँ सूअर

सबकी जगह है

इसलिए नफ़रत नहीं करता था वह

कीचड़ काई या मल से

भेड़ें उसे अच्छी लगती थीं

ऊन ज़रूरी है–वह मानता था

पर कहता था–उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है

उनके थनों की गरमाहट

जिससे खेतों में ढेले

ज़िन्दा हो जाते हैं

उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी

छोटे-छोटे सपनों

और ठीकरों से भरी हुई

उस दुनिया में पुरखे भी रहते थे

और वे भी जो अभी पैदा नहीं हुए

महुआ उसका मित्र था

आम उसका देवता

बाँस-बबूल थे स्वजन-परिजन

और हाँ, एक छोटी-सी सूखी

नदी भी थी उस दुनिया में-

जिसे देखकर– कभी-कभी उसका मन होता था

उसे उठाकर रख ले कंधे पर

और ले जाए गंगा तक–

ताकि दोनों को फिर से जोड़ दे

पर गंगा के बारे में सोचकर

हो जाता था निहत्था!

इधर पिछले कुछ सालों से

जब गोल-गोल आलू

मिट्टी फ़ोड़कर झाँकने लगते थे जड़ों से

या फसल पककर

हो जाती थी तैयार

तो न जाने क्यों वह– हो जाता था चुप

कई-कई दिनों तक

बस यहीं पहुँचकर अटक जाती थी उसकी गाड़ी

सूर्योदय और सूर्यास्त के

विशाल पहियोंवाली

पर कहते हैं–

उस दिन इतवार था

और उस दिन वह ख़ुश था

एक पड़ोसी के पास गया

और पूछ आया आलू का भाव-ताव

पत्नी से हँसते हुए पूछा–

पूजा में कैसा रहेगा सेंहुड़ का फूल?

गली में भूँकते हुए कुत्ते से कहा–

 ख़ुश रह चितकबरा,

ख़ुश रह!

और निकल गया बाहर

किधर?

क्यों?

कहाँ जा रहा था वह–

अब मीडिया में इसी पर बहस है

उधर हुआ क्या

कि ज्यों ही वह पहुँचा मरखहिया मोड़

कहीं पीछे से एक भोंपू की आवाज़ आई

और कहते हैं– क्योंकि देखा किसी ने नहीं–

उसे कुचलती चली गई

अब यह हत्या थी

या आत्महत्या–इसे आप पर छोड़ता हूँ

वह तो अब सड़क के किनारे

चकवड़ घास की पत्तियों के बीच पड़ा था

और उसके होंठों में दबी थी

एक हल्की-सी मुस्कान!

उस दिन वह ख़ुश था।  Go To List ↑

 


दाने / केदारनाथ सिंह

 अकाल में सारस

नहीं

हम मण्डी नहीं जाएंगे

खलिहान से उठते हुए

कहते हैं दाने॔

जाएंगे तो फिर लौटकर नहीं आएंगे

जाते- जाते

कहते जाते हैं दाने

अगर लौट कर आये भी

तो तुम हमे पहचान नहीं पाओगे

अपनी अन्तिम चिट्ठी में

लिख भेजते हैं दाने

इसके बाद महीनों तक

बस्ती में

कोई चिट्ठी नहीं आती।

रचनाकाल : 1984 Go To List ↑

 


फागुन का गीत / केदारनाथ सिंह

गीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!

ये बाँधे नहीं बँधते, बाँहें-

रह जातीं खुली की खुली,

ये तोले नहीं तुलते, इस पर

ये आँखें तुली की तुली,

ये कोयल के बोल उड़ा करते, इन्हें थामे हिया रहता!

अनगाए भी ये इतने मीठे

इन्हें गाएँ तो क्या गाएँ,

ये आते, ठहरते, चले जाते

इन्हें पाएँ तो क्या पाएँ

ये टेसू में आग लगा जाते, इन्हें छूने में डर लगता!

ये तन से परे ही परे रहते,

ये मन में नहीं अँटते,

मन इनसे अलग जब हो जाता,

ये काटे नहीं कटते,

ये आँखों के पाहुन बड़े छलिया, इन्हें देखे न मन भरता! Go To List ↑

 


मेरी भाषा के लोग / केदारनाथ सिंह

मेरी भाषा के लोग

मेरी सड़क के लोग हैं

सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग

पिछली रात मैंने एक सपना देखा

कि दुनिया के सारे लोग

एक बस में बैठे हैं

और हिन्दी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस

हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिन्दी

जो अन्तिम सिक्के की तरह

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में

कहती वह कुछ नहीं

पर बिना कहे भी जानती है मेरी जीभ

कि उसकी खाल पर चोटों के

कितने निशान हैं

कि आती नहीं नींद उसकी कई संज्ञाओं को

दुखते हैं अक्सर कई विशेषण

पर इन सबके बीच

असंख्य होठों पर

एक छोटी-सी खुशी से थरथराती रहती है यह !

तुम झाँक आओ सारे सरकारी कार्यालय

पूछ लो मेज़ से

दीवारों से पूछ लो

छान डालो फ़ाइलों के ऊँचे-ऊँचे

मनहूस पहाड़

कहीं मिलेगा ही नहीं

इसका एक भी अक्षर

और यह नहीं जानती इसके लिए

अगर ईश्वर को नहीं

तो फिर किसे धन्यवाद दे !

मेरा अनुरोध है —

भरे चौराहे पर करबद्ध अनुरोध —

कि राज नहीं — भाषा

भाषा — भाषा — सिर्फ़ भाषा रहने दो

मेरी भाषा को ।

इसमें भरा है

पास-पड़ोस और दूर-दराज़ की

इतनी आवाजों का बूँद-बूँद अर्क

कि मैं जब भी इसे बोलता हूँ

तो कहीं गहरे

अरबी तुर्की बांग्ला तेलुगु

यहाँ तक कि एक पत्ती के

हिलने की आवाज़ भी

सब बोलता हूँ ज़रा-ज़रा

जब बोलता हूँ हिंदी

पर जब भी बोलता हूं

यह लगता है —

पूरे व्याकरण में

एक कारक की बेचैनी हूँ

एक तद्भव का दुख

तत्सम के पड़ोस में । Go To List ↑

 


सार्त्र की क़ब्र पर / केदारनाथ सिंह

सैकड़ों सोई हुई क़ब्रों के बीच

वह अकेली क़ब्र थी

जो ज़िन्दा थी

कोई अभी-अभी गया था

एक ताज़ा फूलों का गुच्छा रखकर

कल के मुरझाए हुए फूलों की

बगल में

एक लाल फूल के नीचे

मैट्रो का एक पीला-सा टिकट भी पड़ा था

उतना ही ताज़ा

मेरी गाइड ने हँसते हुए कहा–

वापसी का टिकट है

कोई पुरानी मित्र रख गई होगी

कि नींद से उठो

तो आ जाना!

मुझे लगा

अस्तित्व का यह भी एक रंग है

न होने के बाद!

होते यदि सार्त्र

क्या कहते इस पर–

सोचता हुआ होटल लौट रहा था मैं Go To List ↑

 


पानी में घिरे हुए लोग / केदारनाथ सिंह

 यहाँ से देखो

पानी में घिरे हुए लोग

प्रार्थना नहीं करते

वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को

और एक दिन

बिना किसी सूचना के

खच्चर बैल या भैंस की पीठ पर

घर-असबाब लादकर

चल देते हैं कहीं और

यह कितना अद्भुत है

कि बाढ़ चाहे जितनी भयानक हो

उन्हें पानी में थोड़ी-सी जगह ज़रूर मिल जाती है

थोड़ी-सी धूप

थोड़ा-सा आसमान

फिर वे गाड़ देते हैं खम्भे

तान देते हैं बोरे

उलझा देते हैं मूंज की रस्सियां और टाट

पानी में घिरे हुए लोग

अपने साथ ले आते हैं पुआल की गंध

वे ले आते हैं आम की गुठलियां

खाली टिन

भुने हुए चने

वे ले आते हैं चिलम और आग

फिर बह जाते हैं उनके मवेशी

उनकी पूजा की घंटी बह जाती है

बह जाती है महावीर जी की आदमकद मूर्ति

घरों की कच्ची दीवारें

दीवारों पर बने हुए हाथी-घोड़े

फूल-पत्ते

पाट-पटोरे

सब बह जाते हैं

मगर पानी में घिरे हुए लोग

शिकायत नहीं करते

वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में

कहीं न कहीं बचा रखते हैं

थोड़ी-सी आग

फिर डूब जाता है सूरज

कहीं से आती हैं

पानी पर तैरती हुई

लोगों के बोलने की तेज आवाजें

कहीं से उठता है धुआं

पेड़ों पर मंडराता हुआ

और पानी में घिरे हुए लोग

हो जाते हैं बेचैन

वे जला देते हैं

एक टुटही लालटेन

टांग देते हैं किसी ऊंचे बांस पर

ताकि उनके होने की खबर

पानी के पार तक पहुंचती रहे

फिर उस मद्धिम रोशनी में

पानी की आंखों में

आंखें डाले हुए

वे रात-भर खड़े रहते हैं

पानी के सामने

पानी की तरफ

पानी के खिलाफ

सिर्फ उनके अंदर

अरार की तरह

हर बार कुछ टूटता है

हर बार पानी में कुछ गिरता है

छपाक……..छपाक……. Go To List ↑

 


दुपहरिया / केदारनाथ सिंह

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से

झुर-झुर सरसों की रंगीनी,

धूसर धूप हुई मन पर ज्यों-

सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए

लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,

चिलबिल की नंगी बाँहों में

भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को चुर-मुर ध्वनि बाँसों के वन की ।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,

रुक कर सहम गई चौबाई,

आँखों के इस वीराने में-

और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की । Go To List ↑

 


मंच और मचान / केदारनाथ सिंह

पनों की तरह बोलते

तने की तरह चुप

एक ठिंगने से चीनी भिक्खु थे वे

जिन्हें उस जनपद के लोग कहते थे

चीना बाबा

कब आये थे रामाभार स्तूप पर

यह कोई नहीं जानता था

पर जानना जरूरी भी नहीं था

उनके लिये तो बस इतना ही बहुत था

कि वहाँ स्तूप पर खड़ा है

चिड़ियों से जगरमगर एक युवा बरगद

बरगद पर मचान है

और मचान पर रहते हैं वे

जाने कितने समय से

अगर भूलता नहीं तो यह पिछली सदी के

पाँचवे दशक का कोई एक दिन था

जब सड़क की ओर से भोंपू की आवाज़ आई

भाइयो और बहनो,

प्रधानमंत्री आ रहे हैं स्तूप को देखने…

प्रधानमंत्री!

खिल गए लोग

जैसे कुछ मिल गया हो सुबह-सुबह

पर कैसी विडम्बना

कि वे जो लोग थे

सिर्फ़ नेहरू को जानते थे

प्रधानमंत्री को नहीं!

सो इस शब्द के अर्थ तक पहुँचने में

उन्हें काफ़ी दिक़्क़त हुई

फिर भी सुर्ती मलते और बोलते-बतियाते

पहुँच ही गये वे वहाँ तक

कहाँ तक?

यह कहना मुश्किल है

कहते हैं प्रधानमंत्री आये

उन्होंने चारों ओर घूम कर देखा स्तूप को

फिर देखा बरगद को

जो खड़ा था स्तूप पर

पर न जाने क्यों

वे हो गये उदास

और कहते हैं नेहरू अक्सर

उदास हो जाते थे

फिर जाते-जाते एक अधिकारी को

पास बुलाया

कहा देखो उस बरगद को गौर से देखो

उसके बोझ से टूट कर

गिर सकता है स्तूप

इसलिये हुक्म है कि देशहित में

काट डालो बरगद

और बचा लो स्तूप को

यह राष्ट्र के भव्यतम मंच का आदेश था

जाने-अनजाने एक मचान के विरुद्ध

इस तरह उस दिन एक अद्भुत घटना घटी

भारत के इतिहास में

कि मंच और मचान

यानी एक ही शब्द के लम्बे इतिहास के

दोनों ओर-छोर

अचानक आ गये आमने-सामने

अगले दिन

सूर्य के घंटे की पहली चोट के साथ

स्तूप पर आ गए

बढ़ई

मजूर

इंजीनियर

कारीगर

आ गए लोग दूर-दूर से

इधर अधिकारी परेशान

क्योंकि उन्हें पता था

खाली नहीं है बरगद

कि उस पर एक मचान है

और मचान भी खाली नहीं

क्योंकि उस पर रहता है एक आदमी

और खाली नहीं आदमी भी

क्योंकि वह ज़िन्दा है

और बोल सकता है

क्या किया जाए?

हुक्म दिल्ली का

और समस्या जटिल

देर तक खड़े-खड़े सोचते रहे वे

कि सहसा किसी एक ने

हाथ उठा प्रार्थना की

चीना बाबा,

ओ…ओ… चीना बाबा!

नीचे उतर आओ

बरगद काटा जायेगा

काटा जायेगा?

क्यों? लेकिन क्यों?

जैसे पनों से फूट कर जड़ों की आवाज़ आई

पर का आदेश है

नीचे से उतर गया

तो शुनो भिक्खु अपनी चीनी गमक वाली

हिन्दी में बोला

चाये काट डालो मुझी को

उतरूंगा नईं

ये मेरा घर है!

भिक्खु की आवाज़ में

बरगद के पनों के दूध का बल था

अब अधिकारियों के सामने

एक विकट सवाल था एकदम अभूतपूर्व

पेड़ है कि घर

यह एक ऐसा सवाल था

जिस पर कानून चुप था

इस पर तो कविता भी चुप हैं

एक कविता प्रेमी अधिकारी ने

धीरे से टिप्पणी की

देर तक

दूर तक जब कुछ नहीं सूझा

तो अधिकारियों ने राज्य के उच्चतम

अधिकारी से सम्पर्क किया

और गहन छानबीन के बाद पाया गया

मामला भिक्खु के चीवर-सा

बरगद की लम्बी बरोहों से उलझ गया है

हार कर पाछ कर अंततः तय हुआ

दिल्ली से पूछा जाय

और कहते हैं

दिल्ली को कुछ भी याद नहीं था

न हुक्म

न बरगद

न दिन

न तारीख़

कुछ भी कुछ भी याद ही नहीं था

पर जब परत दर परत

इधर से बतायी गयी स्थिति की गम्भीरता

और उधर लगा कि अब भिक्खु का घर

यानी वह युवा बरगद

कुल्हाड़े की धार से बस कुछ मिनट दूर है

तो ख़याल है कि दिल्ली ने जल्दी-जल्दी

दूत के जरिये बीजिंग से बात की

इस हल्की सी उम्मीद में कि शायद

कोई रास्ता निकल आए

एक कयास यह भी

कि बात शायद माओ की मेज़ तक गई

अब यह कितना सही है

कितना ग़लत

साक्ष्य नहीं कोई कि जाँच सकूँ इसे

पर मेरा मन कहता है काश यह सच हो

कि उस दिन

विश्व में पहली बार दो राष्ट्रों ने

एक पेड़ के बारे में बातचीत की

तो पाठकगण

यह रहा एक धुंधला सा प्रिण्ट आउट

उन लोगों की स्मृति का

जिन्हें मैंने खो दिया था बरसों पहले

और छपते-छपते इतना और

कि हुक्म की तामील तो होनी ही थी

सो जैसे-तैसे पुलिस के द्वारा

बरगद से नीचे उतारा गया भिक्खु को

और हाथ उठाए मानो पूरे ब्रह्मांड में

चिल्लाता रहा वह

घर है…ये…ये….मेरा घर है

पर जो भी हो

अब मौके पर मौजूद टांगों कुल्हाड़ों का

रास्ता साफ था

एक हल्का सा इशारा और ठक्‌…ठक्‌

गिरने लगे वे बरगद की जड़ पर

पहली चोट के बाद ऐसा लगा

जैसे लोहे ने झुक कर

पेड़ से कहा हो– माफ़ करना भाई,

कुछ हुक्म ही ऐसा है

और ठक्‌ ठक्‌ गिरने लगा उसी तरह

उधर फैलती जा रही थी हवा में

युवा बरगद के कटने की एक कच्ची गंध

और नहीं…नहीं…

कहीं से विरोध में आती थी एक बुढ़िया की आवाज़

और अगली ठक्‌ के नीचे दब जाती थी

जाने कितनी चहचह

कितने पर

कितनी गाथाएँ

कितने जातक

दब जाते थे हर ठक्‌ के नीचे

चलता रहा वह विकट संगीत

जाने कितनी देर तक

कि अचानक

जड़ों के भीतर एक कड़क-सी हुई

और लोगों ने देखा कि चीख़ न पुकार

बस झूमता-झामता एक शाहाना अंदाज़ में

अरअराकर गिर पड़ा समूचा बरगद

सिर्फ घर वह शब्द

देर तक उसी तरह

टंगा रहा हवा में

तब से कितना समय बीता

मैंने कितने शहर नापे

कितने घर बदले

और हैरान हूँ मुझे लग गया इतना समय

इस सच तक पहुँचने में

कि उस तरह देखो

तो हुक़्म कोई नहीं

पर घर जहाँ भी है

उसी तरह टंगा है Go To List ↑

 


प्रक्रिया / केदारनाथ सिंह 

प्रक्रिया | केदारनाथ सिंह  / kedarnath singh ki kavita
प्रक्रिया | केदारनाथ सिंह  / kedarnath singh ki kavita

मैं

जब हवा की तरह

दृश्यों के बीच से गुजरता हुआ

अकेला होता हूँ

तो क्षण भर के लिए

मुझे कहीं भी देखा जा सकता है

किसी भी दिशा में

किसी भी मोड़ पर

किसी भी भाषा के अज्ञात

शब्द-कोश में

पर मैं जब कहीं नहीं होता

सिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश में

सामने की भीड़ को

दूर से पहचानता हुआ

हवा के आर-पार

एक प्रश्न उछालता हूँ

और हँसता हूँ

तो न जाने क्यों

मुझे लगता है

कि गूंजहीन शब्दों के इस घने अंधकार में

मैं —

अर्थ परिवर्तन की

एक अबूझ प्रक्रिया हूँ

जिसके भीतर

ये लोग

झाड़ियाँ

बत्तखें और भविष्य

हर चीज़ एक-दूसरे में

घुली-मिली है

जड़ें रोशनी में हैं

रोशनी गंध में,

गन्ध विचारों में

विचार स्मृतियों में,

स्मृतियाँ रंगों में…

और मैं चुपचाप

इस संपूर्ण व्यतिक्रम को

भीतर संभाले हुए

चलते-चलते

झुककर

रास्ते की धूल से

एक शब्द उठाता हूँ

और पाता हूँ कि अरे

गुलाब! Go To List ↑

 


जनहित का काम / केदारनाथ सिंह

वह एक अद्भुत दृश्य था

मेह बरसकर खुल चुका था

खेत जुतने को तैयार थे

एक टूटा हुआ हल मेड़ पर पड़ा था

और एक चिड़िया बार-बार बार-बार

उसे अपनी चोंच से

उठाने की कोशिश कर रही थी

मैंने देखा और मैं लौट आया

क्योंकि मुझे लगा मेरा वहाँ होना

जनहित के उस काम में

दखल देना होगा। Go To List ↑

 


शहर में रात / केदारनाथ सिंह

बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है

वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है

वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा

वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा

वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे

हैं उलझ गए जीने के सारे धागे

यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ

कुत्ते भुनगे आदमी गिलहरी गाएँ

यह शहर कि जिसकी ज़िद है सीधी-सादी

ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आज़ादी

तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में

यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में

साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ

इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ

जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे

किस तरह रात-भर बजती हैं ज़ंजीरें Go To List ↑

 


एक पारिवारिक प्रश्न / केदारनाथ सिंह

छोटे से आंगन में

माँ ने लगाए हैं

तुलसी के बिरवे दो

पिता ने उगाया है

बरगद छतनार

मैं अपना नन्हा गुलाब

कहाँ रोप दूँ!

मुट्ठी में प्रश्न लिए

दौड़ रहा हूं वन-वन,

पर्वत-पर्वत,

रेती-रेती…

बेकार Go To List ↑

 


अंधेरे पाख का चांद / केदारनाथ सिंह

जैसे जेल में लालटेन

चाँद उसी तरह

एक पेड़ की नंगी डाल से झूलता हुआ

और हम

यानी पृथ्वी के सारे के सारे क़ैदी खुश

कि चलो कुछ तो है

जिसमें हम देख सकते हैं

एक-दूसरे का चेहरा! Go To List ↑

 


बसन्त / केदारनाथ सिंह

और बसन्त फिर आ रहा है

शाकुन्तल का एक पन्ना

मेरी अलमारी से निकलकर

हवा में फरफरा रहा है

फरफरा रहा है कि मैं उठूँ

और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में

कह दूँ ना

एक दृढ़

और छोटी-सी ना

जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध

मेरी छाती में सुरक्षित है

मैं उठता हूँ

दरवाज़े तक जाता हूँ

शहर को देखता हूँ

हिलाता हूँ हाथ

और ज़ोर से चिल्लाता हूँ –

ना…ना…ना

मैं हैरान हूँ

मैंने कितने बरस गँवा दिये

पटरी से चलते हुए

और दुनिया से कहते हुए

हाँ हाँ हाँ… Go To List ↑

 


घड़ी / केदारनाथ सिंह

दुख देती है घड़ी

बैठा था मोढ़े पर

लेता हुआ जाड़े की धूप का रस

कि वहाँ मेज पर नगी चीखने लगी

 जल्दी करो, जल्दी करो

छूट जायेगी बस

गिरने लगी पीठ पर

समय की छड़ी

दुख देती है घड़ी।

जानती हूँ एक दिन

यदि डाल भी आऊँ

उसे कुएँ में ऊबकर

लौटकर पाऊँगा

उसी तरह दुर्दम कठोर

एक टिक् टिक् टिक् टिक् से

भरा है सारा घर

छोड़ेगी नहीं

अब कभी यह पीछा

ऐसी मुँहलगी है

इतनी सिर चढ़ी है

दुख देती है घड़ी।

छूने में डर है

उठाने में डर है

बाँधने में डर है

खोलने में डर है

पड़ी है कलाई में

अजब हथकड़ी

दुख देती है घड़ी। Go To List ↑

 


जे.एन.यू. में हिंदी / केदारनाथ सिंह

जी, यही मेरा घर है

और शायद यही वह पत्थर जिस पर सिर रखकर सोई थी

वह पहली कुल्हाड़ी

जिसने पहले वृक्ष का शिकार किया था

इस पत्थर से आज भी

एक पसीने की गंध आती है

जो शायद उस पहले लकड़हारे के शरीर की

गंध है–

जिससे खुराक मिलती है

मेरे परिसर की सारी आधुनिकता को

इस घर से सटे हुए

बहुत-से घर हैं

जैसे एक पत्थर से सटे हुए बहुत-से पत्थर

और धूप हो की वर्षा यहाँ नियम यह

कि हर घर अपने में बंद

अपने में खुला

पर बगल के घर में अगर पकता है भात

तो उसकी ख़ुशबू घुस आती है

मेरे किचन में

मेरी चुप्पी उधर के फूलदानों तक

साफ़ सुनाई पड़ती है

और सच्चाई यह है कि हम सबकी स्मृतियाँ

अपने-अपने हिस्से की बारिश से धुलकर

इतनी स्वच्छ और ऐसी पारदर्शी

कि यहाँ किसी का नम्बर

किसी को याद नहीं !

विद्वानों की इस बस्ती में जहाँ फूल भी एक सवाल है

और बिच्छू भी एक सवाल

मैंने एक दिन देखा एक अधेड़-सा आदमी

जिसके कंधे पर अंगौछा था

और हाथ में एक गठरी

‘अंगौछा’- इस शब्द से

लम्बे समय बाद मेरे मिलना हुआ

और वह भी जे. एन. यू. में !

वह परेशान-सा आदमी

शायद किसी घर का नम्बर खोज रहा था

और मुझे लगा-कई दरवाज़ों को खटखटा चुकने के बाद

वह हो गया था निराश

और लौट रहा था धीरे-धीरे

ज्ञान की इस नगरी में

उसका इस तरह जाना मुझे ऐसा लगा

जैसे मेरी पीठ पर कुछ गिर रहा हो सपासप्

कुछ देर मैंने उसका सामना किया

और जब रहा न गया चिल्लाया फूटकर–

‘विद्वान लोगो ! दरवाज़ा खोलो

वह जा रहा है

कुछ पूछना चाहता था

कुछ जानना चाहता था वह

रोको.. उस अंगौछे वाले आदमी को रोको…

और यह तो बाद में मैंने जाना

उसके चले जाने के काफ़ी देर बाद

कि जिस समय मैं चिल्ला रहा था

असल में मैं चुप था

जैसे सब चुप थे

और मेरी जगह यह मेरी हिंदी थी

जो मेरे परिसर में अकेले चिल्ला रही थी । Go To List ↑

 


दीपदान / केदारनाथ सिंह

दीपदान / केदारनाथ सिंह - kedarnath singh famous poems
दीपदान / केदारनाथ सिंह – kedarnath singh famous poems

जाना, फिर जाना,

उस तट पर भी जा कर दिया जला आना,

पर पहले अपना यह आँगन कुछ कहता है,

उस उड़ते आँचल से गुड़हल की डाल

बार-बार उलझ जाती हैं,

एक दिया वहाँ भी जलाना;

जाना, फिर जाना,

एक दिया वहाँ जहाँ नई-नई दूबों ने कल्ले फोड़े हैं,

एक दिया वहाँ जहाँ उस नन्हें गेंदे ने

अभी-अभी पहली ही पंखड़ी बस खोली है,

एक दिया उस लौकी के नीचे

जिसकी हर लतर तुम्हें छूने को आकुल है

एक दिया वहाँ जहाँ गगरी रक्खी है,

एक दिया वहाँ जहाँ बर्तन मँजने से

गड्ढा-सा दिखता है,

एक दिया वहाँ जहाँ अभी-अभी धुले

नये चावल का गंधभरा पानी फैला है,

एक दिया उस घर में –

जहाँ नई फसलों की गंध छटपटाती हैं,

एक दिया उस जंगले पर जिससे

दूर नदी की नाव अक्सर दिख जाती हैं

एक दिया वहाँ जहाँ झबरा बँधता है,

एक दिया वहाँ जहाँ पियरी दुहती है,

एक दिया वहाँ जहाँ अपना प्यारा झबरा

दिन-दिन भर सोता है,

एक दिया उस पगडंडी पर

जो अनजाने कुहरों के पार डूब जाती है,

एक दिया उस चौराहे पर

जो मन की सारी राहें

विवश छीन लेता है,

एक दिया इस चौखट,

एक दिया उस ताखे,

एक दिया उस बरगद के तले जलाना,

जाना, फिर जाना,

उस तट पर भी जा कर दिया जला आना,

पर पहले अपना यह आँगन कुछ कहता है,

जाना, फिर जाना!



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