कुंवर नारायण की कविता / Kunwar Narayan Poems In Hindi

अगर आप अगर कुंवर नारायण की कविताओ के शोकिन है तो मै आपको यह बताना सही समझता हूँ की कुंवर नारायण की सभी बेहतरीन कविताओ को पढ़ने के लिए यह सबसे बेहतरीन स्थान है ।

तो चलिए बिना किसी तरह की देर किए Kunwar Narayan Poems की शुरूवात करते है ।


विषय सूची

बीमार नहीं है वह / कुंवर नारायण 

बीमार नहीं है वह / कुंवर नारायण / kunwar narayan ki kavita
बीमार नहीं है वह / कुंवर नारायण / kunwar narayan ki kavita

बीमार नहीं है वह

कभी-कभी बीमार-सा पड़ जाता है

उनकी ख़ुशी के लिए

जो सचमुच बीमार रहते हैं।

किसी दिन मर भी सकता है वह

उनकी खुशी के लिए

जो मरे-मरे से रहते हैं।

कवियों का कोई ठिकाना नहीं

न जाने कितनी बार वे

अपनी कविताओं में जीते और मरते हैं।

उनके कभी न मरने के भी उदाहरण हैं

उनकी ख़ुशी के लिए

जो कभी नहीं मरते हैं। Go To List ↑

 


और जीवन बीत गया / कुंवर नारायण 

और जीवन बीत गया / kunwar narayan poems
और जीवन बीत गया / kunwar narayan poems

इतना कुछ था दुनिया में

लड़ने झगड़ने को

पर ऐसा मन मिला

कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा

और जीवन बीत गया..। Go To List ↑

 


सुबह हो रही थी / कुंवर नारायण

सुबह हो रही थी

कि एक चमत्कार हुआ

आशा की एक किरण ने

किसी बच्ची की तरह

कमरे में झाँका

कमरा जगमगा उठा

 आओ अन्दर आओ, मुझे उठाओ

शायद मेरी ख़ामोशी गूँज उठी थी। Go To List ↑

 


अंग अंग उसे लौटाया जा रहा था / कुंवर नारायण

अंग अंग उसे लौटाया जा रहा था / कुंवर नारायण 
kunwar narayan poems in hindi

अंग-अंग

उसे लौटाया जा रहा था।

अग्नि को

जल को

पृथ्वी को

पवन को

शून्य को।

केवल एक पुस्तक बच गयी थी

उन खेलों की

जिन्हें वह बचपन से

अब तक खेलता आया था।

उस पुस्तक को रख दिया गया था

ख़ाली पदस्थल पर

उसकी जगह

दूसरों की ख़ुशी के लिए। Go To List ↑

 


आवाज़ें / कुंवर नारायण

यह आवाज़

लोहे की चट्टानों पर

चुम्बक के जूते पहन कर

दौड़ने की आवाज़ नहीं है

यह कोलाहल और चिल्लाहटें

दो सेनाओं के टकराने की आवाज़ है,

यह आवाज़

चट्टानों के टूटने की भी नहीं है

घुटनों के टूटने की आवाज़ है

जो लड़ कर पाना चाहते थे शान्ति

यह कराह उनकी निराशा की आवाज़ है,

जो कभी एक बसी बसाई बस्ती थी

यह उजाड़ उसकी सहमी हुई आवाज़ है,

बधाई उन्हें जो सो रहे बेख़बर नींद

और देख रहे कोई मीठा सपना,

यह आवाज़ उनके खर्राटों की आवाज़ है,

कुछ आवाज़ें जिनसे बनते हैं

हमारे अन्त:करण

इतनी सांकेतिक और आंतरिक होती है

कि उनके न रहने पर ही

हम जान पाते हैं कि वे थीं

सूक्ष्म कड़ियों की तरह

आदमी से आदमी को जोड़ती हुई

अदृश्य शृंखलाएँ

जब वे नहीं रहतीं तो भरी भीड़ में भी

आदमी अकेला होता चला जाता है

मेरे अन्दर की यह बेचैनी

ऐसी ही किसी मूल्यवान कड़ी के टूटने की

आवाज़ तो नहीं? Go To List ↑

 


मौत ने कहा / कुंवर नारायण

फ़ोन की घण्टी बजी

मैंने कहा — मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया।

दरवाज़े की घण्टी बजी

मैंने कहा — मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया।

अलार्म की घण्टी बजी

मैंने कहा — मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया।

एक दिन

मौत की घण्टी बजी…

हड़बड़ा कर उठ बैठा —

मैं हूँ… मैं हूँ… मैं हूँ..

मौत ने कहा —

करवट बदल कर सो जाओ। Go To List ↑

 


अलविदा श्रद्धेय! / कुंवर नारायण 

अबकी बार लौटा तो

बृहत्तर लौटूँगा

चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं

कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं

जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को

तरेर कर न देखूँगा उन्हें

भूखी शेर-आँखों से

अबकी बार लौटा तो

मनुष्यतर लौटूँगा

घर से निकलते

सड़को पर चलते

बसों पर चढ़ते

ट्रेनें पकड़ते

जगह बेजगह कुचला पड़ा

पिद्दी-सा जानवर नहीं

अगर बचा रहा तो

कृतज्ञतर लौटूँगा Go To List ↑

 


कमरे में धूप / कुंवर नारायण

हवा और दरवाज़ों में बहस होती रही,

दीवारें सुनती रहीं।

धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी

किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

सहसा किसी बात पर बिगड़ कर

हवा ने दरवाज़े को तड़ से

एक थप्पड़ जड़ दिया !

खिड़कियाँ गरज उठीं,

अख़बार उठ कर खड़ा हो गया,

किताबें मुँह बाये देखती रहीं,

पानी से भरी सुराही फर्श पर टूट पड़ी,

मेज़ के हाथ से क़लम छूट पड़ी।

धूप उठी और बिना कुछ कहे

कमरे से बाहर चली गई।

शाम को लौटी तो देखा

एक कुहराम के बाद घर में ख़ामोशी थी।

अँगड़ाई लेकर पलँग पर पड़ गई,

पड़े-पड़े कुछ सोचती रही,

सोचते-सोचते न जाने कब सो गई,

आँख खुली तो देखा सुबह हो गई। Go To List ↑

 


उजास / कुंवर नारायण

तब तक इजिप्ट के पिरामिड नहीं बने थे

जब दुनिया में

पहले प्यार का जन्म हुआ

तब तक आत्मा की खोज भी नहीं हुई थी,

शरीर ही सब कुछ था

काफ़ी बाद विचारों का जन्म हुआ

मनुष्य के मष्तिष्क से

अनुभवों से उत्पन्न हुई स्मृतियाँ

और जन्म-जन्मांतर तक

खिंचती चली गईं

माना गया कि आत्मा का वैभव

वह जीवन है जो कभी नहीं मरता

प्यार ने

शरीर में छिपी इसी आत्मा के

उजास को जीना चाहा

एक आदिम देह में

लौटती रहती है वह अमर इच्छा

रोज़ अँधेरा होते ही

डूब जाती है वह

अँधेरे के प्रलय में

और हर सुबह निकलती है

एक ताज़ी वैदिक भोर की तरह

पार करती है

सदियों के अन्तराल और आपात दूरियाँ

अपने उस अर्धांग तक पहुँचने के लिए

जिसके बार बार लौटने की कथाएँ

एक देह से लिपटी हैं Go To List ↑

 


एक हरा जंगल / कुंवर नारायण 

 

एक हरा जंगल धमनियों में जलता है।

तुम्हारे आँचल में आग…

 चाहता हूँ झपटकर अलग कर दूँ तुम्हें

उन तमाम संदर्भों से जिनमें तुम बेचैन हो

और राख हो जाने से पहले ही

उस सारे दृश्य को बचाकर

किसी दूसरी दुनिया के अपने आविष्कार में शामिल

 कर लूँ

लपटें

एक नए तट की शीतल सदाशयता को छूकर

 लौट जाएँ। Go To List ↑

 


अच्छा लगा / कुंवर नारायण

पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक

अच्छा लगा,

पेड़ की छाया का सुख

अच्छा लगा,

डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन,

 अब चलूँ सोचा,

तो यह अच्छा लगा… Go To List ↑

 


घंटी / कुंवर नारायण

फ़ोन की घंटी बजी

मैंने कहा- मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया

दरवाज़े की घंटी बजी

मैंने कहा- मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया

अलार्म की घंटी बजी

मैंने कहा- मैं नहीं हूँ

और करवट बदल कर सो गया

एक दिन

मौत की घंटी बजी…

हड़बड़ा कर उठ बैठा-

मैं हूँ… मैं हूँ… मैं हूँ..

मौत ने कहा-

करवट बदल कर सो जाओ। Go To List ↑

 


इतना कुछ था / कुंवर नारायण

इतना कुछ था दुनिया में

लड़ने झगड़ने को

पर ऐसा मन मिला

कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा

और जीवन बीत गया Go To List ↑

 


बात सीधी थी पर / कुंवर नारायण

बात सीधी थी पर एक बार

भाषा के चक्कर में

ज़रा टेढ़ी फँस गई ।

उसे पाने की कोशिश में

भाषा को उलटा पलटा

तोड़ा मरोड़ा

घुमाया फिराया

कि बात या तो बने

या फिर भाषा से बाहर आये-

लेकिन इससे भाषा के साथ साथ

बात और भी पेचीदा होती चली गई ।

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना

मैं पेंच को खोलने के बजाय

उसे बेतरह कसता चला जा रहा था

क्यों कि इस करतब पर मुझे

साफ़ सुनायी दे रही थी

तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह ।

आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था –

ज़ोर ज़बरदस्ती से

बात की चूड़ी मर गई

और वह भाषा में बेकार घूमने लगी ।

हार कर मैंने उसे कील की तरह

उसी जगह ठोंक दिया ।

ऊपर से ठीकठाक

पर अन्दर से

न तो उसमें कसाव था

न ताक़त ।

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह

मुझसे खेल रही थी,

मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा –

“क्या तुमने भाषा को

सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?” Go To List ↑

 


भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में / कुंवर नारायण 

भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में / कुंवर नारायण
kunwar narayan poems in hindi

प्लास्टिक के पेड़

नाइलॉन के फूल

रबर की चिड़ियाँ

टेप पर भूले बिसरे

लोकगीतों की

उदास लड़ियाँ…

एक पेड़ जब सूखता

सब से पहले सूखते

उसके सब से कोमल हिस्से-

उसके फूल

उसकी पत्तियाँ ।

एक भाषा जब सूखती

शब्द खोने लगते अपना कवित्व

भावों की ताज़गी

विचारों की सत्यता –

बढ़ने लगते लोगों के बीच

अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ …

सोच में हूँ कि सोच के प्रकरण में

किस तरह कुछ कहा जाय

कि सब का ध्यान उनकी ओर हो

जिनका ध्यान सब की ओर है –

कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में

आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी

जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी

अपनी ज़मीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ । Go To List ↑

 


गुड़िया / कुंवर नारायण

मेले से लाया हूँ इसको

छोटी सी प्‍यारी गुड़िया,

बेच रही थी इसे भीड़ में

बैठी नुक्‍कड़ पर बुढ़िया

मोल-भव करके लया हूँ

ठोक-बजाकर देख लिया,

आँखें खोल मूँद सकती है

वह कहती पिया-पिया।

जड़ी सितारों से है इसकी

चुनरी लाल रंग वाली,

बड़ी भली हैं इसकी आँखें

मतवाली काली-काली।

ऊपर से है बड़ी सलोनी

अंदर गुदड़ी है तो क्‍या?

ओ गुड़िया तू इस पल मेरे

शिशुमन पर विजयी माया।

रखूँगा मैं तूझे खिलौने की

अपनी अलमारी में,

कागज़ के फूलों की नन्‍हीं

रंगारंग फूलवारी में।

नए-नए कपड़े-गहनों से

तुझको राज़ सजाऊँगा,

खेल-खिलौनों की दुनिया में

तुझको परी बनाऊँगा। Go To List ↑

 


आदमी का चेहरा / कुंवर नारायण

“कुली !” पुकारते ही

कोई मेरे अंदर चौंका ।

एक आदमी आकर खड़ा हो गया मेरे पास

सामान सिर पर लादे

मेरे स्वाभिमान से दस क़दम आगे

बढ़ने लगा वह

जो कितनी ही यात्राओं में

ढ़ो चुका था मेरा सामान

मैंने उसके चेहरे से उसे

कभी नहीं पहचाना

केवल उस नंबर से जाना

जो उसकी लाल कमीज़ पर टँका होता

आज जब अपना सामान ख़ुद उठाया

एक आदमी का चेहरा याद आया Go To List ↑

 


ये पंक्तियाँ मेरे निकट / कुंवर नारायण

ये पंक्तियाँ मेरे निकट आईं नहीं

मैं ही गया उनके निकट

उनको मनाने,

ढीठ, उच्छृंखल अबाध्य इकाइयों को

पास लाने :

कुछ दूर उड़ते बादलों की बेसंवारी रेख,

या खोते, निकलते, डूबते, तिरते

गगन में पक्षियों की पांत लहराती :

अमा से छलछलाती रूप-मदिरा देख

सरिता की सतह पर नाचती लहरें,

बिखरे फूल अल्हड़ वनश्री गाती…

… कभी भी पास मेरे नहीं आए :

मैं गया उनके निकट उनको बुलाने,

गैर को अपना बनाने :

क्योंकि मुझमें पिण्डवासी

है कहीं कोई अकेली-सी उदासी

जो कि ऐहिक सिलसिलों से

कुछ संबंध रखती उन परायी पंक्तियों से !

और जिस की गांठ भर मैं बांधता हूं

किसी विधि से

विविध छंदों के कलावों से। Go To List ↑

 


ये शब्द वही हैं / कुंवर नारायण

यह जगह वही है

जहां कभी मैंने जन्म लिया होगा

इस जन्म से पहले

यह मौसम वही है

जिसमें कभी मैंने प्यार किया होगा

इस प्यार से पहले

यह समय वही है

जिसमें मैं बीत चुका हूँ कभी

इस समय से पहले

वहीं कहीं ठहरी रह गयी है एक कविता

जहां हमने वादा किया था कि फिर मिलेंगे

ये शब्द वही हैं

जिनमें कभी मैंने जिया होगा एक अधूरा जीवन

इस जीवन से पहले। Go To List ↑

 


जिस समय में / कुंवर नारायण 

जिस समय में / कुंवर नारायण / kunwar narayan poems
जिस समय में / कुंवर नारायण / kunwar narayan poems

जिस समय में

सब कुछ

इतनी तेजी से बदल रहा है

वही समय

मेरी प्रतीक्षा में

न जाने कब से

ठहरा हुआ है !

उसकी इस विनम्रता से

काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव

कुछ अधिक

गहरा हुआ है । Go To List ↑

 


अयोध्या, 1992 / कुंवर नारायण

हे राम,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं

उस अविवेक पर विजय

जिसके दस बीस नहीं

अब लाखों सर – लाखों हाथ हैं,

और विभीषण भी अब

न जाने किसके साथ है.

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाग्य

एक विवादित स्थल में सिमट कर

रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है,

 मानस तुम्हारा चरित नहीं

चुनाव का डंका है !

हे राम, कहां यह समय

कहां तुम्हारा त्रेता युग,

कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम

कहां यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुरान – किसी धर्मग्रन्थ में

सकुशल सपत्नीक….

अबके जंगल वो जंगल नहीं

जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक ! Go To List ↑

 


कभी पाना मुझे / कुंवर नारायण

तुम अभी आग ही आग

मैं बुझता चिराग

हवा से भी अधिक अस्थिर हाथों से

पकड़ता एक किरण का स्पन्द

पानी पर लिखता एक छंद

बनाता एक आभा-चित्र

और डूब जाता अतल में

एक सीपी में बंद

कभी पाना मुझे

सदियों बाद

दो गोलाद्धों के बीच

झूमते एक मोती में । Go To List ↑

 


अबकी बार लौटा तो / कुंवर नारायण

अबकी बार लौटा तो

बृहत्तर लौटूंगा

चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं

कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं

जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को

तरेर कर न देखूंगा उन्हें

भूखी शेर-आँखों से

अबकी बार लौटा तो

मनुष्यतर लौटूंगा

घर से निकलते

सड़को पर चलते

बसों पर चढ़ते

ट्रेनें पकड़ते

जगह बेजगह कुचला पड़ा

पिद्दी-सा जानवर नहीं

अगर बचा रहा तो

कृतज्ञतर लौटूंगा

अबकी बार लौटा तो

हताहत नहीं

सबके हिताहित को सोचता

पूर्णतर लौटूंगा Go To List ↑

 


दीवारें / कुंवर नारायण

अब मैं एक छोटे-से घर

और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ

कभी मैं एक बहुत बड़े घर

और छोटी-सी दुनिया में रहता था

कम दीवारों से

बड़ा फ़र्क पड़ता है

दीवारें न हों

तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर। Go To List ↑

 


उत्केंद्रित? / कुंवर नारायण

मैं ज़िंदगी से भागना नहीं

उससे जुड़ना चाहता हूँ। –

उसे झकझोरना चाहता हूँ

उसके काल्पनिक अक्ष पर

ठीक उस जगह जहाँ वह

सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा।

उस आच्छादित शक्ति-स्त्रोत को

सधे हुए प्रहारों द्वारा

पहले तो विचलित कर

फिर उसे कीलित कर जाना चाहता हूँ

नियतिबद्ध परिक्रमा से मोड़ कर

पराक्रम की धुरी पर

एक प्रगति-बिन्दु

यांत्रिकता की अपेक्षा

मनुष्यता की ओर ज़्यादा सरका हुआ… Go To List ↑

 


जन्म-कुंडली / कुंवर नारायण

जन्म-कुंडली / कुंवर नारायण / kunwar narayan ki kavita
जन्म-कुंडली / कुंवर नारायण / kunwar narayan ki kavita

फूलों पर पड़े-पड़े अकसर मैंने

ओस के बारे में सोचा है –

किरणों की नोकों से ठहराकर

ज्योति-बिन्दु फूलों पर

किस ज्योतिर्विद ने

इस जगमग खगोल की

जटिल जन्म-कुंडली बनायी है ?

फिर क्यों निःश्लेष किया

अलंकरण पर भर में ?

एक से शून्य तक

किसकी यह ज्यामितिक सनकी जमुहाई है ?

और फिर उनको भी सोचा है –

वृक्षों के तले पड़े

फटे-चिटे पत्ते—–

उनकी अंकगणित में

कैसी यह उधेडबुन ?

हवा कुछ गिनती हैः

गिरे हुए पत्तों को कहीं से उठाती

और कहीं पर रखती है ।

कभी कुछ पत्तों को डालों से तोड़कर

यों ही फेंक देती है मरोड़कर …।

कभी-कभी फैलाकर नया पृष्ठ – अंतरिक्ष-

गोदती चली जाती…वृक्ष…वृक्ष…वृक्ष Go To List ↑

 


घर पहुँचना / कुंवर नारायण

हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर

अपने अपने घर पहुँचना चाहते

हम सब ट्रेनें बदलने की

झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा

और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं

और घर उनसे मुक्ति

सचाई यूँ भी हो सकती है

कि यात्रा एक अवसर हो

और घर एक संभावना

ट्रेनें बदलना

विचार बदलने की तरह हो

और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों

वही हो

घर पहुँचना

कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता

भाषा में उसका बयान

जिसका पूरा मतलब है सचाई

जिसका पूरी कोशिश है बेहतर इन्सान

उसे कोई हड़बड़ी नहीं

कि वह इश्तहारों की तरह चिपके

जुलूसों की तरह निकले

नारों की तरह लगे

और चुनावों की तरह जीते

वह आदमी की भाषा में

कहीं किसी तरह ज़िन्दा रहे, बस Go To List ↑

 


कविता की ज़रूरत / कुंवर नारायण

बहुत कुछ दे सकती है कविता

क्यों कि बहुत कुछ हो सकती है कविता

ज़िन्दगी में

अगर हम जगह दें उसे

जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़

जैसे तारों को जगह देती है रात

हम बचाये रख सकते हैं उसके लिए

अपने अन्दर कहीं

ऐसा एक कोना

जहाँ ज़मीन और आसमान

जहाँ आदमी और भगवान के बीच दूरी

कम से कम हो ।

वैसे कोई चाहे तो जी सकता है

एक नितान्त कवितारहित ज़िन्दगी

कर सकता है

कवितारहित प्रेम Go To List ↑

 


कविता / कुंवर नारायण

कविता / कुंवर नारायण / kunwar narayan poems
कविता / कुंवर नारायण / kunwar narayan poems

कविता वक्तव्य नहीं गवाह है

कभी हमारे सामने

कभी हमसे पहले

कभी हमारे बाद Go To List ↑

 


यक़ीनों की जल्दबाज़ी से / कुंवर नारायण

एक बार ख़बर उड़ी

कि कविता अब कविता नहीं रही

और यूँ फैली

कि कविता अब नहीं रही !

यक़ीन करनेवालों ने यक़ीन कर लिया

कि कविता मर गई,

लेकिन शक़ करने वालों ने शक़ किया

कि ऐसा हो ही नहीं सकता

और इस तरह बच गई कविता की जान

ऐसा पहली बार नहीं हुआ

कि यक़ीनों की जल्दबाज़ी से

महज़ एक शक़ ने बचा लिया हो

किसी बेगुनाह को । Go To List ↑

 


किसी पवित्र इच्छा की घड़ी में / कुंवर नारायण

व्यक्ति को

विकार की ही तरह पढ़ना

जीवन का अशुद्ध पाठ है।

वह एक नाज़ुक स्पन्द है

समाज की नसों में बन्द

जिसे हम किसी अच्छे विचार

या पवित्र इच्छा की घड़ी में भी

पढ़ सकते हैं ।

समाज के लक्षणों को

पहचानने की एक लय

व्यक्ति भी है,

अवमूल्यित नहीं

पूरा तरह सम्मानित

उसकी स्वयंता

अपने मनुष्य होने के सौभाग्य को

ईश्वर तक प्रमाणित हुई ! Go To List ↑

 



 

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