surdas ki jivani

सूरदास का नाम भक्तिकालीन कवियों में सर्वोपरि है । सूरदास 15 वीं शताब्दी के कवि थे जो बचपन से ही अन्धे थे । भक्तिकाल को भारत का स्वर्णकाल माना जाता है । सूरदास जी को वात्सल्य इस का सम्राट माना जाता है ।

उन्होने श्रृंगार और शान्त रसो का भी बड़ा मर्मस्पर्शी वर्णन किया है । सूरदास जी श्री कृष्ण के अन्य भक्त थे । और ये भक्तिकाल के सगुण धारा के कवि थे ।

Surdas ki Jivani

सूरदास का जीवन :-

                   सूरदास का जन्म 1478 ई. में रूनकता नामक गांव में हुआ था । कुछ विद्वानो का मत है कि इनका जन्म सीही नामक गांव में हुआ था । इनके पिता का नाम रामदास था जो कि एक गायक थे । सूरदास जी जन्म से अन्धे थे । सूरदास जी शुरू से ही भक्ति में लीन रहते थे ।

सूरदास के गुरू :-

                बल्लभ संप्रदाय की कथाओं के अनुसार सुरदास जन्म से अंधे थे , इससे 6 वर्ष की आयु मे ही उनका बहिष्कार उनके घरवालो द्वारा ही किया गया । जब उनकी भटें बल्लभाचार्य से हुई । तो उस समय श्री बल्लभाचार्य जी से बहुत प्रभावित हुए ।

जिसके फलस्वरूप सूरदास जी ने तथा श्री बल्लभाचार्य जी के सानिध्य में रहकर उन्होने पुष्टिमार्ग में चलने की दीक्षा प्राप्त की और कृष्णपद का गायन करने लगे थे ।

साहित्यिक व्यक्तित्व :-

                     सूरदास जी हिंदी काव्य जगत के महान कवि है । ये हिन्दी काव्य-जगत में सूरदास कृष्ण भक्ति की अनन्त भाव को दर्शानेवाले कवि माने जाते है । सूरदास जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । इन्होने अपनी रचनाओ में कृष्ण लीला के कई रूपों को चित्रित करते है ।

इनके काव्य में बाल-भाव एवं वात्सत्य भाव में झलकता है , इन्हे वात्सत्य सम्राट भी कहा जाता है। सूरसागर इनके अमर कृति का आधार है । इनकी रचनाओ में गहन कृति झलकती है ।

सूरदास जी की काव्य की विशेषताएं :-

                                 सूरदास ने अपनी प्रतिभा के अनुसार कृष्ण की बाललीला का सुंदर मनोहर रूप से चित्रित किया है ।

कला पक्ष विशेषता

भाषा :-

        सूरदास जी ने बज्र भाषा को अपने काव्यों में प्रयोग किया । इन्होने कहीं कहीं अवधी , संस्कृत , फारसी आदि भाषाओ के शब्दो का प्रयोग भी किया है ।

शैली :-

                इन्होने कथा-वर्णन में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है । उनकी शैली सरल एवं प्रभावशाली है ।

अलंकार :-

          सूरदास जी अपने शब्दों में सरल सहज अंलकार प्रयोग किया है । इनके काव्य में उत्प्रेक्षा, व्यतिरेक , रूपक आदि अलंकार है ।

भाव पक्ष

भक्ति भाव :-

                           भक्तिभाव सूरदास में कुल 2 कर था । इन्होने श्री कृष्ण को अपना मित्र माना है ।

सूरदास जी के पद संगीत को सुनने वालो पर गहरा असर पड़ता है।

रचनाएं :-

                  सूर सागर , सूर सारावली , साहित्य लहरी , नल-दमयन्ती और ब्याहलो इनकी पाँच ग्रंथ बताई जाती है ।

सूरसागर:-

                   सूरसागर सूरदास जी सबसे प्रसिध्द रचना है , इसमें माना जाता है की कृष्ण के भक्ति पर का सवा लाख पदे का संग्रह है । इस समय 7 से 8 हजार पद है । सूरदास जी के सूरसागर ग्रंथ में 12 अध्याय है ।

इसमें भक्तिरस प्रधान है । सूरदास जी की रचनाएं सहज सौंदर्य से परिपूर्ण है ।

सूरसावली :-

                         सूरसावली ग्रंथ में 1107 छंद है , इस ग्रंथ में रचना के अनुसार उनकी उम्र 67 वर्ष थी ।

साहित्य लहरी :-

               इसमें 117 पदों की लघु रचना है , साहित्य लहरी में रस , अलंकार और नायिका के अन्तर को दिखाया गया है ।

नल दमयंती :-

             नल दमयंती में सूरदास की कृष्ण भक्ति नही अपितु महाभारत काल के नल और दमयंती की कहानी है ।

युधिष्ठिर को जुएं मे हराकर वनवास जाने के बाद एक ऋषि द्वारा सुनाई जाती है ।

व्यालो :-

                  यह ग्रंथ भी नल दमयंती के समान ही है ।

मृत्यु :-

               सूरदास की मृत्यु वर्ष 1580 में हुई थी । अपने लम्बे जीवन में इन्होने केवल कृष्ण भक्ति की । तथा ग्रंथ व काव्य पद लिखे । सूरदास जी ने गोवरधर्न के पास बसे पारसौली नामक गांव में प्राण त्यागे , जहां आज सूरश्याम मंदिर की स्थापना की गई है ।

सूरदास जी का योगदान हिन्दी साहित्य में सदैव सर्वोपरी रहेगा ।

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